पांडु पुत्र युधिष्ठिर ने आखिर क्यों दिया अपनी ही मां कुंती को श्राप, जाने यहां

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महाभारत की कथा तो हर कोई जानता है। जिसमें बढ़ रहे अधर्म को खत्म कर धर्म की स्थापना के लिए पांडु पुत्रों ने कौरवों से युद्ध किया था। इसकी बहुत सी घटनाओं के विषय में लोग जानते है लेकिन कुछ ऐसी भी घटनाएं है जो लोगों को पता ही नहीं है। इस लेख में हम पांडु पुत्र युधिष्ठिर के द्वारा अपनी ही मां कुंती को दिए गए श्राप के विषय में बताएंगे।
अक्सर कहा जाता है कि महिलाओं के पेट में बात नहीं रहती है। वे चाहे कितना भी प्रयास करे अपने अंदर बात रख नहीं पाती है। युधिष्ठिर ने कुंती को जो श्राप दिया था उसे इस बात से ही जोड़ा जाता है। माना जाता है कि कुंती ने अपने पुत्रों से एक राज की बात छिपाई थी और वह राज युद्ध के अंतिम समय में पांडु पु़त्रों को पता चली थी। जिससे धर्म राज कहे जाने वाले युधिष्ठिर को जब पता चली तब वे बहुत क्रोधित थे और इसलिए उन्होंने अपनी माता को श्राप दे दिया।

पांच पुत्र के अलावा एक और था कुंती का पुत्र

महाभारत में उल्लेखित है कि कुंती के पांच पुत्र थे जिसमें सबसे बड़ा युधिष्ठिर, फिर भीम, अर्जुन, नकुल व सहदेव थे। लेकिन इनके अलावा एक और पुत्र भी था जिसका नाम कर्ण था। दुर्वासा ऋषि के दिए गए वरदान के कारण कुंती को देवताओं से पुत्र की प्राप्ति हुई थी उस वरदान के तहत कुंती जिस भी देव का आह्वान उस मंत्र का जाप कर करेगी उसको उस देव के द्वारा पुत्र प्रदान किया जाएगा। कुंती ने विवाह से पूर्व ही सूर्य देव का आह्वान कर दिया था जिससे उसे सूर्य पुत्र कहे जाने वाले पराक्रमी बालक कर्ण पुत्र के रूप में मिला। लेकिन लोक लाज के चलते उसने उसे टोकरी में रखकर नदी में बहा दिया था। इस तरह से कुंती के पांच नहीं छह पुत्र थे। जिनमें से सबसे बड़ा कर्ण था और इस बात का पता किसी को नहीं था।
अपने ही भाई का वध कर हुए थे दुखी पांडव

अपने ही भाई का वध कर हुए थे दुखी पांडव

जब महाभारत में युद्ध हुआ तब सूर्य पुत्र कर्ण अपने मित्र दुर्योधन के तरफ से युद्ध में शामिल हुआ था। कर्ण ने अपने पराक्रम से युद्ध में अपनी वीरता दर्ज की। वहीं उसके हाथों अभिमन्यु का वध हुआ और भी कई पराक्रमी योद्धाओं को मृत्यु के घाट उतारा था। अंतिम समय में अर्जुन ने कर्ण को मारा था। उस दौरान वहां कुंती पहुंची और उसने कर्ण को अपना पुत्र होने की बात अपने पांचों पुत्रों को बताई। तब पांडव पुत्रों को बहुत दुःख हुआ। युधिष्टिर ने इसे अधर्म माना और अपने ही हाथों अपने बड़े भाई का वध करने की बात पता चली तो सभी नाराज भी हुए। लेकिन मां कुंती को कुछ कहा नहीं और इस तरह से वर्षो तक बात छुपाए रहने के कारण ही ऐसा हुआ यह सोचकर उन्होंने माता कुंती को श्राप दिया कि आपने जो किया वह कोई भी दूसरी स्त्री न कर सके। इसलिए उन्होंने स्त्रियों के पेंट में बात न रहने का श्राप दिया। तब से ही ऐसा माना जाता है कि महिलाओं को बताई गई बात वे चाहकर भी अपने अंदर नहीं रख पाती है।

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