महादेव ने क्यों दी थी रावण को सजा, तब शिव तांडव की रचना की रावण ने, पढ़े पूरा लेख

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महादेव के पूजन के इस माह में हम उनसे जुड़ी हुई कुछ खास बातें बता रहे है। इस लेख के माध्यम से हम रावण द्वारा शिव तांडव की रचना के विषय में बताएंगे। महादेव के कई भक्त हुए लेकिन उनके भक्तों में रावण भी एक माना जाता है।

माना जाता है कि रावण ने सभी देवी-देवताओं को परास्त किया है लेकिन महादेव एक अकेले देव है जिससे वे हार गए और उनके समक्ष नतमस्तक होकर उन्हें अपना ईष्ट देव स्वीकार कर लिया।

कुबेर और रावण दोनों ही ऋषि विश्रवा की संतान थे। दोनों सौतेले थे। व्यवहार और आचार-विचार में काफी अंतर था। रावण महाज्ञाता तो था लेकिन अहंकारी भी था। उसका मानना था कि वह सभी चीजें हासिल कर सकता है।

उससे बड़ा कोई नहीं। इसी अहंकार के कारण उसके सारे गुण दब गए। वह आसुरी प्रवृत्तियों, बुराई और अन्याय का प्रतीक बन गया। रावण के अनेकानेक गुण थे। अपने देश में ही बहुत से स्थानों पर रावण दहन नहीं होता है।

कहीं वह पूजा भी जाता है। वह चार वेदों का ज्ञाता, वास्तुकार, शिल्पकार, आयुर्वेद का महान ज्ञाता, संस्कृत का प्रकांड पंडित, संगीतज्ञ, राजनीतिज्ञ होने के साथ-साथ महादेव का भक्त था।

ऐसे बना रावण महादेव का भक्त

शिव पुराण में महादेव की महिमा का उल्लेख स्पष्ट रूप से किया गया है। रावण ने सभी देवी-देवताओं का परास्त कर स्वर्ग पर चढ़ाई कर दी थी। तब वह महादेव के कैलाश पर्वत पर भी अपना अधिकार करना चाहता था।

अपनी शक्ति का उसे इतना घमंड हो गया था कि वह सभी को अपने समक्ष सूक्ष्म मानने लगा था। एक बार वह पुष्पक विमान से सैर कर रहा था तब उसके विमान के सामने पर्वत आ गया और वहां पर विमान की गति कम हो गई।

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रावण को आश्चर्य हुआ कि पुष्पक विमान जिसकी गति बहुत तेज होती है। वह यहां कैसे धीमी गति से चलने लगा। नंदीष्वर ने उसे बहुत समझाया कि यहां से चले जा महादेव अभी ध्यान में लीन है।

लेकिन अहंकारी रावण नहीं माना और वह उस पर्वत को जीतने के लिए उसे हिलाने का प्रयास करने लगा। पर्वत को हिलता देख कर मां पार्वती महादेव के समक्ष पहुंची और महादेव से कहने लगी की स्वामी यह क्या हो रहा

है। पर्वत क्यों हिल रहा है। तब महादेव मुस्कुराए और पार्वती को देखते रहे। रावण ने पर्वत की नींव पर हाथ रखा ही था कि मां पार्वती ने महादेव से इसे रोकने को कहा तब भगवान शंकर ने अपने पैर के अंगूठे का भार बढ़ा दिया।

भगवान शंकर ने अपने पैर के अंगूठे से उसको दबा दिया। रावण का हाथ उसमें दब गया। बहुत कोशिश की लेकिन रावण मुक्त नहीं हो सका। दर्द से वह कराहता रहा। तब माता पार्वती ने रावण को मुक्त करने महादेव से प्रार्थना की।

रावण के मंत्रियों ने समझाया की महादेव दयालु है लेकिन आपके इस कार्य से कुपित हो गए है इनकी स्तुति करो। तब असहनीय दर्द से कराहते हुए रावण ने शिव तांडव स्त्रोत की रचना की।

इससे भगवान शंकर प्रसन्न हुए और रावण को भार से मुक्त किया। रावण महादेव के चरणों में आकर गिर गया और महादेव से क्षमा मांगते हुए उन्हें अपना ईष्ट देव स्वीकार किया।

महादेव को ही माना श्रेष्ठ

रावण ने इस घटना के बाद महादेव की शक्ति का अहसास कर लिया और वह जीवन भर महादेव की पूजा-अर्चना करता रहा। वह महादेव के समक्ष ही जाकर अपने दुःख, दर्द व पीड़ा को बताता था। महादेव ने अपने इस भक्त को कई बार सही मार्ग पर चलने राह दिखाया परंतु रावण के अहंकार के चलते ही उसे भविष्य में विष्णु के श्री राम अवतार से मोक्ष की प्राप्ति हुई।

समस्त दोषों से मुक्त करता है शिव ताड़व स्त्रोत

यदि कालसर्प दोष है या कोई पितृ दोष से पीड़ित है तो उसके लिए शिव तांडव स्त्रोत अमोघ औषधि है। इसके एक बार ही पाठ करने से सारे ताप दूर हो जाते है। शिव तांडव स्त्रोत पढ़ते हुए शंकर जी को काले तिल से स्नान कराते रहिए समस्त दोष व कष्ट से मुक्ति मिल जाएगी।

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