देवऋषि नारद ने क्यों नहीं किया विवाह, जाने कारण

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हिन्दू धर्म में सोलह संस्कार माने गए है। उनमें विवाह संस्कार सभी के लिए महत्वपूर्ण है। चाहे देवता हो या मनुष्य हर कोई इस संस्कार को पूर्ण कर अपने जीवन की नई शुरुआत कर अपने वंश वृक्ष को रोपता है।

लेकिन क्या आपको पता है देवऋषि नारद ने आखिर विवाह क्यो नहीं किया। अन्य देवी-देवता की तरह गृहस्थ आश्रम का सुख क्यों नहीं ग्रहण किया। इस लेख के माध्यम से हम देवऋषि नारद के विवाह न होने के कारण को बताएंगे।

देवऋषि नारद ब्रह्मा के पुत्र माने जाते है। वे किसी एक स्थान पर टिक नहीं सकते है। उन्हें देवताओं का संवाददाता माना जाता है।

जो तीनों लोकों में भ्रमण करते हुए देवताओं को जानकारी देते है। नारद मुनि भगवान श्री हरि विष्णु व माता लक्ष्मी के परम भक्त है। हर समय उनके मुख से नारायण-नारायण का ही मंत्र सुनने को मिलता है।

काम देव पर विजय पाकर हुआ नारद को अंहकार

एक बार नारद मुनि भगवान विष्णु की भक्ति में साधना करने बैठे थे। ज्ञानी-ध्यानी नारद मुनि को तप करते देख देवराज इंद्र को लगा कि कहीं नारद मुनि अपने तप के बल पर स्वर्ग की प्राप्ति तो नहीं करना चाहते।

इस पर उन्होंने कामदेव को स्वर्ग की अप्सराओं के साथ नारद मुनि का तप भंग करने भेजा। लेकिन नारद मुनि पर कामदेव की माया की कोई प्रभाव नहीं पड़ा।

तब डरे हुए कामदेव नारद मुनि से क्षमा मांगकर वापस चले गए। कामदेव की माया से मुक्त रहने पर नारद मुनि को इस बात का अहंकार हो गया। जब वे इस बात को श्रीहरि विष्णु को सुना रहे थे तभी भगवान ने उनका अहंकार मुक्त करने का निश्चय किया

इस तरह किया नारद को अहंकार से मुक्त

जब नारद बैकुंठ से लौट रहे थे तब रास्ते में उन्हें सुंदर व समृद्ध नगर दिखा। जिसमें बहुत बड़ा राजमहल था यह नगर श्रीहरि ने अपनी योग माय से निर्मित किया था।

नारद मुनि वहां पहुंच तब वहां के राजा ने उनका स्वागत किया और अपनी सुंदर पुत्री का हाथ देखकर भविष्य बताने कहा। राजकुमारी इतनी सुंदर थी कि नारद मोहित हो गए।

राजा ने राजकुमारी के स्वयंवर की बात कहीं। तब नारद मुनि भगवान विष्णु के पास पहुंचे और खुद को सुंदर रूपवान बनाने को कहा। भगवान ने नारद को सुंदर बना दिया। जब स्वयंवर में गए तो नारद को लगा कि वरमाला उन्हीं को पहनाएगी राजकुमारी।

लेकिन एेसा नहीं हुआ और दूसरे राजकुमार को वरमाला पहना दी। जब नारद ने खुद के मुख को पानी में देखा तो मुख देखकर क्रोधित हुए। क्योंकि उनका मुख बंदर का था। तब उन्होंने विवाह करने का विचार त्याग दिया।

भगवान विष्णु को दिया श्राप

बंदर का मुख देने के कारण नारद ने क्रोधित होकर भगवान विष्णु को श्राप दिया कि आप ने मुझे जो मुख देकर उपहास किया है। उन्हीं बंदरों की सहायता पृथ्वी में जन्म लेने पर आपको लेनी होगी।

आपने मुझे स्त्री वियोग दिया है आप भी स्त्री वियोग से पीडि़त होगे। श्राप देने के बाद नारद को समझ आया कि यह सब भगवान विष्णु ने अहंकार मुक्त करने के लिए किया है। तब से ही नारद मुनि ने विवाह न कर भगवान का ध्यान करते रहने का संकल्प लिया।

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