खाटू श्याम कौन है, जाने इस लेख में पूरी कथा

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बाबा श्याम। हारे का सहारा के नाम से जाने जाते है। खाटू श्याम की महिमा को आज हर कोई जानता है। लेकिन खाटू श्याम कौन है और इतना इनको माना क्यो जाता है। इस विषय में हम अपने लेख के माध्यम से बताएंगे। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर खाटू श्याम की महिमा को बताएंगे।

खाटू श्यामजी नीले घोड़े पर सवार। मोर्विनंदन खाटू नरेश और शीश का दानी। जितने निराले बाबा श्याम के नाम और भक्त है। उतना ही रोचक इनका इतिहास है। खाटू श्याम की महिमा भी अपार है।


खाटू श्याम की कथा
कौरव वंश के राजा दुर्योधन ने निर्दोष पांडवों को सताने और उन्हें मारने के लिए लाक्षागृह का निर्माण किया था पर सौभाग्यवश वे उसमें से बच निकले और वनवास में रहने लगे। एक समय जब वे वन में सो रहे थे उस स्थान के पास ही एक हिडम्ब नामक राक्षस अपनी बहन हिडिम्बी सहित रहता था।

तब उनको मनुष्य पांडवों की गंध आई तो उन्हें देखकर यह राक्षस अपनी बहन से बालो इन मनुष्यों को मारकर मेरे पास ले आओ। अपने भाई के आदेश से वह वहां आई जहां पर सभी भाई कुंती सहित सो रहे थे और भीम उनकी रक्षा में जग रहा था।

भीम के स्वरूप को देखकर हिडिम्बी उस पर मोहित हो और मन में यह सोचने लगी मेरे लिए उपयुक्त पति यही हो सकता है। उसने भाई की परवाह किए बिना भीम को पति मान लिया।

कुछ देर बाद हिडिम्बी के वापस न लौटने पर हिडम्बासुर वहां आया स्त्री के सुंदर भेष में अपनी बहन को भीम से बात करता देख क्रोधित हो गया। इसके बाद हिडिम्बी के अनुनय विनय से माता कुंती व युधिष्ठिर के निर्णय से दोनों का गंर्धव विवाह हुआ।

उस अवधि के अंतर्गत हिडिम्बी गर्भवती हुई और एक महाबलवान पुत्र को जन्म दिया। बाल रहित होने से बालक का नाम घटोत्कच रख गया।

हिडिम्बा ने कहा कि मेरा भीम के साथ रहने का समय समाप्त हो गया है और आवश्यकता होने पर पुनः मिलने के लिए कह वह अपने स्थान पर चली गई। साथ ही घटोत्कच भी सभी को प्रणाम करके आज्ञा लेकर चला गया। जल्द ही कृष्ण के कहने पर मण्पिुर में मुरदेत्य की लड़की कामकंटका से गंर्धव विवाह हुआ।

कुछ समय व्यतीत होने के बाद उन्हें पराक्रमी पुत्र को जन्म दिया। जिसके शेर की भांति सुंदर केशों को देखकर उसकानाम बर्बरीक रखा। बल प्राप्ति के लिए उसने देवियों की निरंतर आराधना कर तीनों लोगों में किसी में ऐसा दुर्लभ अतुलनीय बल का वरदान पाया।

देवियों ने बर्बरीक को कुछ समय वहीं निवास करने के लिए कहा और कहा कि एक विजय नामक ब्राम्हण आएंगे। उनके संग में तुम्हारा और अधिक कल्याण होगा।

आज्ञानुसार ब्राम्हण वहां आए और सात शिवलिंग की पूजा की साथ ही विद्या की सफलता के लिए देवियों की पूजा की। ब्राम्हण को स्वप्न में आकर कहा कि सिद्ध माता के सामने आंगन में साधना करो बर्बरीक तुम्हारी सहायता करेगा।

ब्राम्हण के आदेश से बर्बरीक ने साधना में विघ्न डालने वाले सभी राक्षसों को यमलोक भेज दिया। उन असुरों को मारने पर नागों के राजा वासुकी वहां आए और बर्बरीक को दान मांगने के लिए कहा। तब बर्बरीक ने विजय की निर्विघ्न तपस्या सफल हो यही वर मांगा।

ब्राम्हण की तपस्या सफल होने पर उसने बर्बरी को युद्ध में विजयी होने का वरदान दिया। इसके बाद विजय को देवताओं ने सिद्धश्चर्य प्रदान किया। तब उसे नका नाम सिद्ध सेन हो गया।

श्रीकृष्ण ने ली बर्बरीक की परीक्षा
कुछ काल बीत जाने के बाद कुरूक्षेत्र मैदान में कौरवों और पांडवों के बीच में युद्ध की तैयारियां होने लगी। इस अवसर पर बर्बरीक भी अपने तेज नीले घोडे़ पर सवार होकर आ रहे थे।

तब रास्ते में ही भगवान श्रीकृष्ण ने बर्बरीक की परीक्षा लेने के लिए ब्राम्हण का भेष धरा और उसके पास पहुंचे। भगवान ने बर्बरीक की मन की बात जानने के लिए उससे पूछा कि तुम किसी ओर से युद्ध लड़ने आए हो तब बर्बरीक ने कहा कि जो कमजोर पक्ष होगा उसकी ओर से मैं युद्ध लडूंगा।

भगवान ने बर्बरीक से कहा कि तुम तीन बाणों से सारी सेना को कैसे नष्ट कर सकते होत ब एक बाण से ही निशान हो जाए और दूसरा उसे बेध देगा।

कृष्ण ने मुट्ठी व पैर के नीचे दो पत्ते छिपा लिए पर देखते ही एक बाण से क्षण भर में सब पत्ते बिंध गए तब श्रीकृष्ण ने देखा वास्तव में यह एक ही बार में सबको यमलोक भेज सकता है।

तब ब्राम्हण बने श्रीकृष्ण ने बर्बरीक से याचना की तब बर्बरीक ने कहा हे ब्राम्हण क्या चाहते हो। तब श्रीकृष्ण ने कहा कि क्या सबूत है जो मै मांगूगा वह मुझे मिल जाएगा।

तब बर्बरीक ने कहा जब वचन की बात है तो तुम प्राण भी मांगोगे तो मिल जाएगा। तो ब्राम्हण के भेष में नटवर बोले मुझे तुम्हारा शीश का दान चाहिए। यह बात सुनकर बर्बरीक स्तब्ध रह गया और बोले मैं अपना वचन सहर्श पूरा करूंगा पर सत्य कहो आप कौन हो,

तब श्रीकृष्ण ने अपना विराट स्वरूप दिखाया। कहा कि मैंने सोच कि यदि तुम युद्ध में हिस्सा लोगे तो दोनो कुल पूर्णतया नश्ट हो जाएगे। तब बर्बरीक ने कहा कि आप मेरा शीश का दान तो ले लीजिए पर मेरी एक इच्छा है कि मैं युद्ध को आखिर तक देख सकू।

तब भगवान ने कहा कि तुम्हारी इच्छा पूरी होगी। तब बर्बरीक ने अपना शीश धड़ से काटकर दे दिया। शीश को अमृत जड़ियों के सहारे पहाड़ के उंचे शिखर पीपल पर स्थापित किया। 18 दिन तक चले युद्ध में पांडवों को विजय प्राप्त हुआ।

पांडवों का घमंड तोड़ा
जब पांडवों को अपनी जीत का घमंड हो गया। तब श्रीकृष्ण उन सबको लेकर वहां पहुंचे जहां बर्बरीक का सिर स्थापित था। बर्बरीक के सामने पांडव अपनी-अपनी वीरता का बखान करने लग गए।

तब बर्बरीक के सिर ने कहा कि आप सबका घमंड करना व्यर्थ है। जीत श्रीकृष्ण की नितिज्ञ से ही मिली है। मुझे तो इस युद्ध में श्रीकृष्ण का सुदर्शन चक्र ही चलता नजर आया। इसके बाद बर्बरीक चुप हो गए

आकाश से फूलों की वर्षा होने लगी। तब भगवान श्रीकृष्ण ने प्रसन्न् होकर बर्बरीक को वरदान दिया कि कलियुग में मेरे श्याम नाम से पूजे जाओगे और तुम्हारे सुमिरन से सभी मनोरथ पूर्ण होंगे।

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