सबसे पहले किसने किया था श्राद्ध, जाने कैसे शुरू हुई परंपरा

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पितरों को समर्पित श्राद्ध यानी की पितृ पक्ष की शुरुआत हो रही है। आगामी 2 सितंबर से पितृ पक्ष शुरू हो रहा है।

पितृ पक्ष में क्या करना है, कैसे करना है हर कोई जानता है।

लेकिन क्या कोई जानता है कि श्राद्ध की परंपरा कैसे शुरू हुई।

सबसे पहले श्राद्ध कर्म किसने किया। इस लेख के माध्यम से हम इसकी जानकारी देंगे।

महाभारत के अनुशासन पर्व में भी भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को श्राद्ध के संबंध में कई ऐसी बातें बताई है।

जो वर्तमान समय में बहुत कम लोग जानते है। महाभारत में ये भी बताया गया है। कि श्राद्ध की परंपरा कैसे शुरू हुई।

फिर कैसे ये धीरे-धीरे जनमानस तक पहुंची। महर्षि निमि ने शुरू की श्राद्ध की परंपरा

महाभारत के अनुसार सबसे पहले श्राद्ध का उपदेश महर्षि निमि को महातपस्वी अत्रि मुनि ने दिया था। इस प्रकार पहले निमि ने श्राद्ध आरंभ किया।

उसके बाद अन्य महर्षि भी श्राद्ध करने लगे। धीरे-धीरे चारों वर्णों के लोग श्राद्ध में पितरों को अन्न देने लगे।

अग्नि देव का है महत्व

लगातार श्राद्ध का भोजन करते-करते देवता और पितर पूर्ण तृप्त हो गए। श्राद्ध का भोजन लगातार करने से पितरों को अजीर्ण रोग हो गया।

इससे कष्ट होने लगा। तब वे ब्रम्हाजी के पास गए और उनसे कहा कि श्राद्ध का अन्न खाते-खाते हमें अजीर्ण रोग हो गया है।

इससे हमें कष्ट हो रहा है। आप हमारा कल्याण कीजिए। पितरों की बात सुनकर ब्रम्हाजी बोले मेले निकट ये अग्निदेव बैठे है।

ये ही आपका कल्याण करेंगे। अग्निदेव बोले पितरों अब से श्राद्ध में हम लोग साथ ही भोजन किया करेंगे।

मेरे साथ रहने से आप लोगों का अजीर्ण रोग दूर हो जाएगा।

यह सुनकर देवता व पितर प्रसन्न हुए। इसलिए श्राद्ध में सबसे पहले अग्नि का भाग दिया है।

ब्रम्ह राक्षस भी रहते है दूर

शास्त्रों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि हवन में जो पितरों को निमित्त पिंडदान दिया जाता है।

उसे ब्रम्हराक्षस भी दूषित नहीं करते।

इसलिए श्राद्ध में अग्निदेव को देखकर राक्षस भी वहां से चले जाते है।

अग्नि हर चीज को पवित्र कर देती है। पवित्र खाना मिलने से देवता और पितर प्रसन्न हो जाते है।

ऐसे करे श्राद्ध

पिंडदान सबसे पहले पिता को उनके बाद दादा को और उनके बाद परदादा को देना चाहिए। शास्त्रों में यहीं श्राद्ध की विधि बताई गई है। जिसका भी पिंडदान आप दे रहे है।

उस समय एकाग्रचित्त होकर गायत्री मंत्र का जप तथा सोमाय पितृमते स्वाहा का जप करे।

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