व्यक्ति का मूल्यांकन करते समय उसकी निर्दोषता व निखालसता को ध्यान में रखो-जैन मुनि पंथक

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बिलासपुर- टिकरापारा स्थित जैन भवन में चल रहे आनलाइन चातुर्मास प्रवचन में मुनिश्री पंथक ने कहा कि बहुत से लोगों की जिंदगी निराशाजनक होती है। जो कुछ है वह यह कि वह लोग सामने वाले व्यक्ति की जीवन शैली व व्यवहार को ठीक ढंग से समझ नहीं पाते हैं, और इसी कारण से ऐसे लोग सामने वाले व्यक्ति को निर्दोष की जगह दोषी समझ लेते हैं। अगर हम दूसरों की जीवन शैली एवं व्यवहार पर हर समय नजर रखते हैं व लक्ष्य में रखते रहेंगे तो हमारी उनके प्रति नफरत व घृणा बढ़ती ही रहेगी। हालांकि हो सकता है , सामने वाले व्यक्ति का रहन-सहन व्यवहार थोड़ा विचित्र हो हो सकता है, और इस प्रकार की शैली से हम लोग विचलित हो जाते हैं, तो हम पूरी प्रक्रिया में खास बात यह है कि हमें खुद में ही बदलाव लाने की जरूरत है।

इस प्रक्रिया में सामने वाले की अपराधिक प्रवृत्ति या समाज के प्रति हानिकारक कार्यपद्धती को स्वीकार कर लेना या नजरअंदाज करना अथवा तो उसकी तरफदारी यानी कि तारीफ करना ऐसी कोई बात नहीं है। कहने का तात्पर्य यह है कि हम लोगों को ऐसे लोगों की ऐसी हरकतों को वजह से अपना मन जलाने वह परेशान होने की जरूरत नहीं है, हमें ऐसे लोगों के प्रति अपना नजरिया यदि बदलना है , तो हमें उनके निर्दोष था सरलता व निका लगता को ध्यान से देखने की आदत बनानी पड़ेगी । याद रखो की ऐसे प्रकार के विचित्र हरकत करने वाले लोग प्रायः करके जीवन से हारे हुए होते हैं।

हताश लोग होते हैं ऐसे लोग अंदरूनी अपनी ओर से प्रेम वह सहानुभूति की अपेक्षा रखते हैं। ऐसे हालात में हम लोग अपने खुद में परिवर्तन लाकर ऐसे लोगों के प्रति प्रेम वह सहानुभूति व्यक्त करेंगे तो वह लोग कृतकृत्य व खुश खुशाल हो जाएंगे और इस तरह हमें कुछ दवा ना नहीं होगा और पूरा समाज खुशहाल और प्रेम पूर्वक रहेगा

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