मकर संक्रांति पर तिल दान व तिल खाने का क्या है महत्व, जाने विस्तार से

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मकर संक्रांति ही एक ऐसा पर्व है जिसका निर्धारण सूर्य की गति से होता है। पौष मास में जब सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते है। उस काल विशेष को ही संक्रांति कहते है।

शनि देव मकर राशि के स्वामी है और जब सूर्य मकर में प्रवेश करता है तो उसे मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि इस दिन सूर्य का मकर राशि में प्रवेश होने से ही सारे शुभ काम शुरु हो जाते है।

जैसे बच्चों के मुंडन, छेदन संस्कार, गृह प्रवेश जैसे कार्य होते है। इस पर्व में खास तौर पर तिल का उपयोग दान के लिए और ग्रहण करने के लिए किया जाता है। तिल व गुड़ से बनी लड्डू हर कोई खाता है। हर घर में तिल व गुड़ से बनी लड्डू भोग में लगाई जाती है।

ये है तिल खाने का वैज्ञानिक आधार

सब मकर संक्रांति पर तिल-गुड़ के लड्डू तो खाते है। पर इसका वैज्ञानिक आधार क्या है नहीं जानते है। मकर संक्रांति पर तिल-गुड़ का सेवन करने के पीछे वैज्ञानिक आधार यह है कि सर्दी के मौसम में जब शरीर को गर्मी की आवश्यकता होती है तब तिल-गुड़ के व्यंजन यह काम बखूबी करते है।

तिल में तेल की प्रचुरता होती है और प्रोटीन, कैल्शियम, बी काम्पलेक्स और कार्बोहाइट्रेड जैसे तत्व पाए जाते है। तिल में सेसमीन एंटीआॅक्सीडेंट्स होते है जो कई बीमारियों के इलाज में मदद करते है। इसे जब गुड़ में मिलाकर खाते है तो इसके हेल्थ बेनिफिट्स और बढ़ जाते है। गुड़ की तासीर भी गर्म होती है

तिल के लड्डू के बगैर अधूरी है संक्रांति

तिल व गुड़ को मिलाकर जो व्यंजन बनाए जाते है। वह सर्दी के मौसम में हमारे शरीर में आवश्यक गर्मी पहुंचाते है। यहीं कारण है कि मकर संक्रांति के अवसर पर तिल व गुड़ के व्यंजन प्रमुखता से खाए जाते है।

सौ गुणा पुण्य मिलता है दान से

शास्त्रों के मुताबिक इस अवसर पर किया गया दान सौ गुणा पुण्य प्राप्त होता है। मकर संक्रांति के दिन घी और कंबल के दान का भी महत्व है। इस दिन तिल का दान सबसे ज्यादा पुण्यकारी माना जाता है।

इस वजह से तिल व तिल से बनी लड्डू का दान किया जाता है। इस त्योहार का संबंध केवल धार्मिक ही नहीं बल्कि इसका संबंध ऋतु परिवर्तन और कृषि से है। इस दिन से दिन एवं रात दोनों बराबर होते है।

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