कृष्ण व शुक्ल पक्ष क्या है और उसका महत्व क्या है, पढ़े पूरा लेख

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जब भी हिन्दी कैलेंडर देखते है तो उसमें कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष के विषय में उल्लेख होता है। लेकिन इसके विषय में बहुत कम लोग ही जानते है। आखिर कृष्ण पक्ष व शुक्ल पक्ष क्या होता है और इसका क्या महत्व है इस लेख के माध्यम से हम बताएंगें।

पंचांग हिन्दू धर्म का कैलेंडर है और हिन्दू धर्म में पंचांग का बहुत महत्व होता है। पंचांग पांच कारकों यानी तिथि, योग, करण, वार और नक्षत्र के अनुसार गणना और कार्य करता है इसलिए इसका नाम पंचांग रखा गया है।

12 माह होते है पंचांग के मुताबिक

पंचांग के मुताबिक एक साल में 12 महीने होते है और इस में एक दिन को एक तिथि कहते है इस तिथि की अवधि 19 घंटे से 24 घंटे तक की हो सकती है। पंचांग में यह भी माना जाता है कि हर माह में तीस दिन होते है और इन महीनों की गणना सूरज और चंद्र की गति के अनुसार ही की जाती है।

चंद्रमा की कलाओं के ज्यादा होने या कम होने के अनुसार ही महीने को दो पक्षों में बांटा गया है। जिन्हें कृष्ण पक्ष व शुक्ल पक्ष कहा जाता है।

कृष्ण पक्ष के विषय में जाने

पूर्णिमा और अमावस्या के मध्य के भाग को कृष्ण पक्ष कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि पूर्णिमा के अगले ही दिन से ही कृष्ण पक्ष शुरू हो जाता है। कृष्ण पक्ष को किसी भी शुभ कार्य के लिए उचित नहीं माना जाता है

और ज्योतिष ऐसा कहते है कि इस पक्ष में या इस दौरान कोई भी ऐसा काम नहीं करना चाहिए जो शुभ हो जैसे विवाहए मुंडन या घर में कोई भी अन्य विषेश अवसर।

इसके पीछे भी कई तर्कों व पौराणिक कथाओं का उल्लेख मिलता है। जैसे पूर्णिमा के बाद जब चंद्रमा घटता है यानी चंद्रमा की कलाएं कम होती है तो चंद्रमा की शक्ति यानी बल भी कमजोर होता है।

इसके साथ ही चंद्रमा के आकार में कमी आने से रातें अंधेरी होती है इस कारण से भी इस पक्ष को उतना शुभ नहीं माना जाता। जितना शुक्ल पक्ष को मानते है।

जाने शुक्ल पक्ष के बारे में

अमावस्या और पूर्णिमा के बीच के अंतराल को शुक्ल पक्ष कहा जाता है अमावस्या के बाद के 15 दिन इस पक्ष में आते है। अमावस्या के अगले ही दिन से चंद्रमा का आकार बढ़ना शुरू हो जाता है या ऐसा कहा जाए कि चंद्रमा की कलाएं भी बढ़ती है

जिससे चंद्रमा बड़ा होता जाता है और रांते अंधेरी नहीं रहती बल्कि चांद की रौशनी से चमक जाती है और चांद की चांदनी से भर उठती है।

इस दौरान चंद्र बल मजबूत होता है और यहीं कारण है कि कोई भी शुभ काम करने के लिए इस पक्ष को उपयुक्त और सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। किसी भी नए काम की शुरुआत भी शुक्ल पक्ष में ही की जाती है।

यह है पौराणिक कथा

कृष्ण पक्ष व शुक्ल पक्ष कीशास्त्रों में वर्णित कथा के अनुसार दक्ष प्रजापति की 27 बेटियां थी इन सभी का विवाह दक्ष प्रजापति ने चंद्रमा से किया। दक्ष प्रजापति की ये 27 पुत्रियां वास्तव में 27 नक्षत्र थी।

चंद्रमा सभी में सबसे ज्यादा रोहिणी से प्रेम करते थे। चंद्रमा बाकी सभी से रूखा हुआ व्यवहार करते थे। ऐसे में बाकी सभी बेटियों ने अपने पिता दक्ष से इस बात की शिकायत की।

तब राजा दक्ष ने चंद्रमा को डांटा और कहा कि सभी पुत्रियों के साथ समान व्यवहार करे। इसके बाद भी चंद्रमा का रोहिणी के प्रति प्यार कम नहीं हुआ और बाकी पत्नियों को नजर अंदाज करते रहे।

इस बात को लेकर दक्ष प्रजापति ने गुस्से में आकर चंद्राम को क्षय रोग का श्राप दे दिया। इसी श्राप के चलते चंद्रमा का तेज धीरे-धीरे मध्यम होता गया। तभी से कृष्ण पक्ष बना।

श्राप से चंद्रमा का क्षय होने लगा तब चंद्रमा ने महादेव की आराधना की और चंद्रमा की आराधना से प्रसन्न होकर चंद्रमा को अपनी जटा में धारण कर लिया।

शिवजी के प्रताप से चंद्रमा का तेज फिर से लौटने लगा और उन्हें जीवनदान मिला। दक्ष के श्राप को रोका नहीं जा सकता था

ऐसे में श्राप में बदलाव करते हुए चंद्रमा को हर 15-15 दिनों में कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष में जाना पड़ता है। इस तरह से शुक्ल पक्ष बना।

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