वरलक्ष्मी व्रत 31 को, समस्त सुख प्रदान करेगी मां वरलक्ष्मी, पढ़े लेख में

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वरलक्ष्मी व्रत पूजा धन और समृद्धि की देवी की पूजा करने के लिए महत्वपूर्ण दिनों में से एक है। वरलक्ष्मी जो भगवान विष्णु की पत्नी है देवी महालक्ष्मी के रूपों में से ही एक है। वरलक्ष्मी का दूधिया महासागर में जन्म हुआ था। जिसे किशीर सागर भी कहा जाता है। इस लेख के माध्यम से हम वरलक्ष्मी व्रत के महत्व व पूजन विधि को बताएंगे।
यह माना जाता है कि देवी का वरलक्ष्मी स्वरूप वरदान देता है और अपने भक्तों की सभी इच्छाओं को पूरा करता है इसलिए देवी के इस रूप को वर लक्ष्मी के रूप में जाना जाता है देवी लक्ष्मी का वो रूप जो वरदान देता है। वरलक्ष्मी व्रत पूजा विधि लक्ष्मी पूजा के समान ही होता है।

श्रावण शुक्ल पक्ष के दौरान अंतिम शुक्रवार को होती है पूजा

वर लक्ष्मी व्रत श्रावण शुक्ल पक्ष के दौरान एक सप्ताह पूर्व शुक्रवार को मनाया जाता है। ये रक्षाबंधन और श्रावण पूर्णिमा से कुछ दिन पहले ही आता है या कहा जा सकता है कि श्रावण शुक्लपक्ष के अंतिम शुक्रवार को यह पूजन किया जाता है। इस व्रत की अपनी खास महिमा है। इस व्रत को रखने से घर की दरिद्रता खत्म हो जाती है साथ ही परिवार में सुख-संपत्ति बनी रहती है। वेदों, पुराणों एवं शास्त्रों के अनुसार श्रावण मास के शुक्लपक्ष में मनाया जाता है। इस साल वरलक्ष्मी व्रत 31 जुलाई को मनाया जाएगा।

यह है धार्मिक मान्यता

इस व्रत को लेकर कई धार्मिक मान्यताएं है जिसके अनुसार यह व्रत शादीशुदा जोड़ों को संतान प्राप्ति का सुख प्रदान करता है। नारीत्व का व्रत होने के कारण सुहागिन स्त्रियां अति उत्साह से ये व्रत रखती है। इस व्रत को करने से व्रती को सुख, सम्पत्ति, वैभव की प्राप्ति होती है। वरलक्ष्मी व्रत को रखने से अष्टलक्ष्मी पूजन के बराबर फल की प्राप्ति होती है। अगर पत्नी के साथ उनके पति भी इस व्रत को रखा जाए तो इसका महत्व कई गुना बढ़ जाता है। यह व्रत कर्नाटक तथा तमिलनाडु राज्य में बड़े ही उत्साह से मनाया जाता है।

पूजन व व्रत की सामग्री

वरलक्ष्मी व्रत पूजा के लिए आवश्यक वस्तुओं को पहले से एकत्र करना चाहिए। इस सूची में दैनिक पूजा वस्तुओं को शामिल नहीं किया गया है। लेकिन यह केवल उन वस्तुओं को सूची बद्ध करता है जो विशेष रूप से वरलक्ष्मी व्रत पूजा के लिए आवश्यक है। इस पूजा के लिए देवी वरलक्ष्मी की प्रतिमा, फूल माला, कुमकुम, हल्दी, चंदन चूर्ण पाउडर, विभूति, दर्पण, कंघी, आम पत्र, फूल, पान के पत्ते, पंचामृत, दही, केला, दूध, पानी, अगरबत्ती, मौली, धूप, कर्पुर, पूजा के लिए घंटी, प्रसाद, तेल दीपक व अक्षत।

पूजा की विधि

व्रती को इस दिन प्रातःकाल जगना चाहिए। घर की साफ-सफाई कर स्नान-ध्यान से निवृत्त होकर पूजा स्ािल को गंगाजल से पवित्र कर लेना चाहिए। इसके बाद ही व्रत का संकल्प करना चाहिए। मां लक्ष्मी की मूर्ति को नए कपड़ों, जेवर और कुमकुम से सजाएं। ऐसा करने के बाद पाटे पर गणपति जी की मूर्ति के साथ मां लक्ष्मी की मूर्ति को पूर्व दिशा में स्थित करें और पूजा स्ािल पर थोड़ा सा तांदूल फेलाए। एक कलश में जल भरकर उसे तांदूल पर रखे।

इसके बाद कलश के चारों तरफ चंदन लगाए। कलश के पास पान, सुपाड़ी, सिक्का, आम के पत्ते आदि डाले। इसके बाद एक नारियल पर चंदन, हल्दी, कुमकुम लगाकर उस कलश पर रखे। एक थाली में लाल वस्त्र, अक्षत,फल, फूल, दूर्वा, दीप, धूप आदि से मां लक्ष्मी की पूजा करनी चाहिए। मां की मूर्ति के समक्ष दीया जलाएं और साथ ही वरलक्ष्मी व्रत की कथा पढ़े। पूजा समाप्त होने के बाद प्रसाद महिलाओं को बांटे। इस दिन व्रती को निराहार रहना चाहिए। रात्रि काल में आरती-अर्चना के बाद फलहार करना उचित माना जाता है।

वरलक्ष्मी व्रत की कथा

पौराणिक कथा के अनुसार एक बार मगध राज्य में कंुड़ी नामक एक नगर था। कथानुसार कुंडी नगर का निर्माण स्वर्ग से हुआ था। इस नगर में एक ब्राम्हणी नारी चारूमति अपने परिवार के साथ रहती थी। चारूमति कतव्र्यनिष्ठ नारी थी जो अपने सास, ससुर एवं पति की सेवा और मां लक्ष्मी जी की पूजा-अर्चना कर एक आदर्श नारी का जीवन व्यतीत करती थी।

एक रात्रि में चारूमति को मां लक्ष्मी सपने में आकर बोली चारूमति हर शुक्रवार को मेरे निमित्त मात्र वरलक्ष्मी व्रत को किया करो। इस व्रत के प्रभाव से तुम्हे मनोवांछित फल प्राप्त होगा। अलगे सुबह चारूमति ने मां लक्ष्मी द्वारा बताए गए वर लक्ष्मी व्रत को समाज के अन्य नारियों के साथ विधिवत पूजन किया। पूजन के सम्पन्न होने पर सभी नारियां कलश की प्ररिक्रमा करने लगी। परिक्रमा करते समय समस्त नारियों के शरीर विभिन्न स्वर्ण आभूषणों से सज गए।

उनके घर भी स्वर्ण के बन गए तथा उनके यहां घोड़े-हाथी, गाय आदि पशु भी आ गए। सभी नारियां चारूमति क प्रशंसा करने लगे। क्योंकि चारूमति ने ही उन सबको इस व्रत विधि के बारे में बताई थी। कालांतर में यह कथा भगवान शिव जी ने माता पार्वती को कहा था। इस व्रत को सुनने मात्र से लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है।


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