समस्त सुखों को प्रदान करने वाला है वैभव लक्ष्मी व्रत, पढ़े पूजन विधि

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हिन्दू धर्म ऐसा शायद ही कोई दिन होगा जब कोई खास संयोग नहीं बनता हो। हर दिन कोई न कोई पूजा व कोई न कोई व्रत होता ही है। उसी तरह से समस्त सुखों को प्रदान करने वाली देवी मां लक्ष्मी की पूजा वैभव लक्ष्मी व्रत के माध्यम से की जाती है।

माना जाता है कि इस व्रत को करने वाले के सभी दुःख दूर हो जाते है और उसके जीवन में खुशहाली आती है। इस लेख के माध्यम से हम वैभव लक्ष्मी व्रत की कथा व पूजन विधि को विस्तार से बताएंगे।

वैभव लक्ष्मी व्रत घर में सुख-समृद्धि की कामना को पूर्ण करता है। यदि आर्थिक तंगी का कोई सामना कर रहा हो तो इस व्रत को यदि श्रद्धाभाव से करता है तो उसको मां लक्ष्मी की कृपा मिलती है। मां लक्ष्मी की पूजा व व्रत के लिए खास तौर पर शुक्रवार को बताया गया है। इस दिन विधिवत जो भी पूजा करता है उसके कष्ट दूर हो जाते है।

संकल्प लेकर इस व्रत को करते है शुरू

वैभव लक्ष्मी का व्रत शुरू करने वाले भक्त को सर्व प्रथम इस व्रत के पूजन विधि को जानना होता है। फिर व्रत के लिए 11 व 21 शुक्रवार को व्रत करने का संकल्प करते हुए मनोरथ मन में देवी मां के समक्ष बताकर इस व्रत को प्रारंभ किया जाता है। इस दौरान यदि किसी शुक्रवार को व्रत नहीं कर पा रहे तो मां लक्ष्मी से मांफी मांग ले और अगले शुक्रवार को पुनः व्रत करे।

पूजन विधि

वैभव लक्ष्मी का पूजन शाम को किया जाता है। शाम को भगवान श्री गणेश, माता लक्ष्मी और श्री यंत्र को एक चैकी पर लाल कपड़ा बिछाकर स्थापित करे। चैकी पर थोड़े चावल रख कर उस पर जल से भरा तांबे का कलश रखें। कलष पर एक कटोरी रखें और उसमें सोने या चांदी का कोई गहना अक्षत और लाल फूल चढ़ाएं।

कथा का पाठ कर माता की आरती कर भोग अर्पित करे। माता को चावल की खीर का भोग लगाएं और यह ध्यान रखें कि व्रत वाले दिन आपको रात को यही खीर खाकर ही रहना है। अगर आप पूरे दिन का व्रत नहीं रख पा रहे है तो रात को भोजन कर सकते है।

व्रत के उद्यापन की विधि

जितने भी शुक्रवार के व्रत करने की मन्नत मांगी थी उतने शुक्रवार हो जाए तब अंतिम व्रत वाले शाम को कथा का श्रवण कुछ सुहागिन स्त्रियों के संग करे। यदि इस व्रत को कुंवारी कन्याएं करती है तो उद्यापन में कुंवारी कन्याओं को बुलाकर पूजन करें।

सुहाग की सामग्री अर्पित करते हुए सुहागिन महिलाएं माता को खीर का भोग अर्पित करे और सभी सुहागिनों को सुहाग की सामग्री बांटकर सभी को एक-एक वैभव लक्ष्मी का पुस्तक अवश्य दे। भोजन कराएं और उपहार के रूप में कुछ सामग्री अवश्य ही दे।

पूजन के बाद वैभव लक्ष्मी के धनलक्ष्मी स्वरूप को नमन कर प्रार्थना करे। हे मां धनलक्ष्मी मैंने आपका वैभवलक्ष्मी व्रत करने की मन्नत मानी थी वह व्रत आज पूर्ण किया है हमारी मनोकामना पूरी करो मां। यह कह कर वैभव लक्ष्मी को प्रणाम करे।

वैभव लक्ष्मी व्रत कथा

किसी शहर में अनेक लोग रहते थे सभी अपने-अपने कामनों में लगे रहते थे। किसी को किसी की परवाह नहीं थी। भजन-कीर्तन, भक्तिभाव, दया-माया, परोपकार जैसे संस्कार कम हो गए। शहर में बुराईयां बढ़ गई थीं। शराब, जुआ, रेस, व्यभिचार, चोरी-डकैती वगैरह बहुत से गुनाह शहर में होते थे।

इनके बावजूद शहर में कुछ अच्छे लोग भी रहते थे। ऐसे ही लोगों में शीला और उनके पति की गृहस्थी मानी जाती थी। शीला धार्मिक प्रकृति की और संतोषी स्वभाव वाली थी। उनका पति भी विवेकी और सुशील था। शीला और उसका पति कभी किसी की बुराई नहीं करते थे और प्रभु भजन में अच्छी तरह समय व्यतीत कर रहे थे।

शहर के लोग उनकी गृहस्थी की सराहना करते थे। देखते ही देखते समय बदल गया। शीला का पति बुरे लोगों से दोस्ती कर बैठा। अ बवह जल्द से जल्द करोड़पति बनने के सपने देखने लगा। इसलिए वह गलत रास्ते पर चल पड़ा फलस्वरूप वह

रोड़पति बन गया। यानी रास्ते पर भटकते भिखारी जैसी उसकी हालत हो गई थी। शराब, जुआ, रेस, चरस-गांजा वगैरह बुरी आदतों में शीला का पति भी फंस गया। दोस्तों के साथ उसे भी शराब की आदत हो गई। इस प्रकार उसने अपना सब कुछ रेस जुंए में गंवा दिया।

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शिला को पति के बर्ताव से बहुत दुःख हुआ, किंतु वह भगवान पर भरोसा कर सबकुछ सहने लगी। वह अपना अधिकांश समय प्रभु भक्ति में बिताने लगी। अचानक एक दिन दोपहर को उनके द्वार पर किसी ने दस्तक दी। शीला ने द्वार खोला तो देखा कि एक मां जी खड़ी थी।

उसके चेहरे पर अलौकिक तेज निखर रहा था। उनकी आंखों में से मानो अमृत बह रहा था। उसको देखते ही शीला के मन में अपार शांति छा गई। शीला के रोम-रोम में आनंद छा गया। शीला उस मां जी को आदर के साथ घर में ले आई। घर में बिठाने के लिए कुछ भी नहीं था। अतः शीला ने सकुचाकर एक फटी हुई चद्दर पर उसको

बिठाया। मां जी बोली क्यों शीला मुझे पहचाना नही, हर शुक्रवार को लक्ष्मीजी के मंदिर में भजन-कीर्तन के समय मैं भी वहां आती हूं। इसके बाद भी शीला कुछ समझ नहीं आईं अतः मैं तुम्हे देखने चली आई। मां जी के अति प्रेम भरे शब्दों से शीला का हृदय पिघल गया।

उसकी आंखों में आंसू आ गए और वह बिलख-बिलखकर रोने लगी। मांजी ने कहा बेटी-सुख और दुःख तो धूप और छांव जैसी होते है। धैर्य रखो बेटी मुझे अपनी सारी परेशानी बता। मां जी के व्यवहार से शीला को काफी संबल मिला और सुख की आस में उसने मांजी को अपनी सारी कहानी कह सुनाई।

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कहानी सुनकर मां जी ने कहा कर्म की गति न्यारी होती है। हर इंसान को अपने कर्म भुगतने ही पड़ते है इसलिए तू चिंता मत कर। अब तू कर्म भुगत चुकी है। अब तुम्हारे सुख के दिन अवश्य आएंगे। तू तो मां लक्ष्मीजी की भक्त है। मां लक्ष्मीजी तो प्रेम और करूणा की अवतार है।

वे अपने भक्तों पर हमेशा ममता रखती है। इसलिए तू धैर्य रखकर मां लक्ष्मी जी का व्रत कर। इससे सब कुछ ठीक हो जाएगा। शीला के पूछने पर मां जी उसे व्रत की सारी विधि भी बताई। मां जी ने कहा बेटी मां लक्ष्मी जी का व्रत

बहुत सरल है। उसे वरदलक्ष्मी व्रत या वैभव लक्ष्मी व्रत कहा जाता है। यह व्रत करने वाले की सब मनोकामना पूर्ण होती है। वह सुख-संपत्ति और यश प्राप्त करता है। शीला यह सुनकर आंनदित हो गई। शीला ने संकल्प करके आंखे खोली तो सामने कोई न था।

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वह विस्मित हो गई कि मांजी कहां गई। शीला को तत्काल यह समझते देर न लगी कि मां जी और कोई नहीं साक्षात लक्ष्मीजी ही थी। दूसरे दिन शुक्रवार था। सबेरे स्नान करके स्वच्छ कपड़े पहनकर शीला ने मां जी द्वारा बताई विधि से पूरे मन से व्रत किया। आखिरी में प्रसाद वितरण हुआ।

यह प्रसाद पहले पति को खिलाया। प्रसाद खाते ही पति के स्वभाव में फर्क पड़ गया। उस दिन उसने शीला को मारा नही, सताया भी नहीं। शीला को बहुत आनंद हुआ। उनके मन में वैभवलक्ष्मी व्रत के लिए श्रद्धा बढ़ गई। शीला ने पूर्ण श्रद्धा-भक्ति से इक्कीस शुक्रवार तक वैभव लक्ष्मी व्रत किया। 21वें शुक्रवार को मां जी के कहे मुताबिक उद्यापन विधि करके सात स्त्रियों को वैभव लक्ष्मी व्रत की सात पुस्तकें उपहार में दी।

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फिर माता जी के धन लक्ष्मी स्वरूप की छवि को वंदन करके भाव से म नही मन प्रार्थना करने लगी। हे मां धनलक्ष्मी ! मैंने आपका वैभव लक्ष्मी व्रत करने की मन्नत मानी थी वह व्रत आज पूर्ण किया है। हे मां मेरी हर विपत्ति दूर करो। हमारा सबका कल्याण करो।

जिसे संतान न हो उसे संतान देना। सौभाग्यवती स्त्री का सौभाग्य अखंड रखना। कुंवारी कन्याओं को मनभावन पति देना। जो आपका यह चमत्कारी वैभवलक्ष्मी व्रत करे। उनकी सब विपत्ति दूर करना। सभी को सुखी करना। हे मां आपकी महिमा अपार है।

ऐसा बोलकर लक्ष्मीजी के धन लक्ष्मी स्वरूप की छवि को प्रणाम किया। व्रत के प्रभाव से शीला का पति अच्छा आदमी बन गया और कड़ी मेहनत करके व्यवसाय करने लगा। उसने तुरंत शीला के गिरवी रखे गहने छुड़ा लिए।

घर में धन की बाढ़ सी आ गई। घर में पहले जैसी सुख-शांति छा गई। वैभव लक्ष्मी व्रत का प्रभाव देखकर मोहल्ले की दूसरी स्त्रियां भी विधिपूर्वक वैभव लक्ष्मी व्रत करने लगी।

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