जब तक पाप को पाप नहीं समझेंगे तब तक पाप का निवारण नहीं हो सकता – जैन मुनि पंथक

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बिलासपुर – हमारे दैनिक जीवन, खानपान और अपने विचार शैली में बहुत सी ऐसी घटनाएं होती है । जो पाप कारी है, फिर भी उसमें हमें पाप जैसा कुछ महसूस होता नहीं है । जैसे कि जिमीकंद दूसरे अन्य वनस्पति की तरह एक वनस्पति है फिर भी तीर्थंकर भगवान ने उस जिमीकंद में सुई की नोक के बराबर भाग में भी अनंत जीव का वास बतलाया है ।

जबकि दूसरे प्रकार की वनस्पति में इतनी ही भाग में एक ही जीव का वास बतलाया है। यह जानकारी प्राप्त होने के बाद हमारा धर्म बनता है कि जिमीकंद का त्याग करना चाहिए । उक्त बातें टिकरापारा स्थित जैन भवन में परम पूज्य गुरुदेव पंथक मुनि ने ऑनलाइन चातुर्मास प्रवचन में कही ।

उन्होंने आगे कहा वैसे ही पानी की एक बूंद में भगवान महावीर ने पानी में अपकाय नामक जीव असंख्यात प्रमाण में बतलाया है । इसी प्रकार रात्रि भोजन के समय ऊपर के अवकाशीय क्षेत्र में से संपातिम काय नाम के वायु का जीव अपनी आजू बाजू के सृष्टि में आकर फैल जाते हैं। जो कि एक दम छोटे व जिसे हम बारीकी से भी देख नहीं सकते हैं , और उसमें कोई हलचल भी नहीं होते हैं ।

ऐसे असंख्य प्रमाण में जीव हमारे रात्रि भोजन के साथ हमारे मुंह में चला जाता है । जो कि एक प्रकार का मांस भक्षण हो जाता है । जो कुछ प्रवाही रात्रि के समय पीते हैं । वह जीवों का लहू पीने जैसा हो जाता है । यदि जितना हो सके पाप को पाप समझने की कोशिश करना चाहिए ताकि जिसमें बहुत से पापों से बचा जा सकता है ।

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