रामायण के विचार जो हमेशा आपको बनाएंगे श्रेष्ठ, जाने यहां

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रामचरित मानस में भगवान श्री राम के चरित्र का चित्रण बहुत ही प्रभावशाली तरीके से किया गया है उतने ही प्रभावशाली तरीके से भगवान राम के माध्यम से जीवन को जीने का तरीका भी बताया है। रामचरितमानस सिर्फ एक महापुराण नहीं है यह एक पुरुष राम के महापुरुष बनने तक की गाथा है।

जो उन्हें मर्यादापुरुषोत्तम राम बनाती है। राम जी के द्वारा रामायण में बहुत सी बातें बताई गई है जिन्हें अपना कर व्यक्ति खुद को दूसरों से श्रेष्ठ बना सकता है। इस लेख के माध्यम से हम जानकारी देंगे।

ऐसे लोगों की मदद करते है श्री राम

नाथ दैव कर कवन भरोसा। सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा।।

कादर मन कहु एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा।।

रामचरित मानस में इसके माध्यम से उस समय को बताती है जब भगवान राम सागर पार करने के लिए सागर से रास्ता मांगतन के लिए ध्यान करने जा रहे थे। लक्ष्मणजी ने तब भगवान रामजी को उनकी शक्ति और क्षमता को याद दिलाते हुए कहा था कि आप स्वयं इतने शक्तिशाली है कि एक बाण में समुद्र को सुखा सकते है, फिर सागर से अनुनय-विनय क्यो।

भगवान राम यह सब जानते थे लेकिन फिर भी इन्होंने शक्ति से पहले शांति से परिस्थितियों को हल करने का प्रयास किया और बताया कि शक्तिशाली को संयमी होना भी जरूरी है। आप अपने भरोसे काम कीजिए ईश्वर स्वयं आपकी सहायता करेंगे।

भगवान की मर्जी से होता है सब

बोले बिहसि महेस तब ग्यानी मूढ़ न कोई।

जेहि जस रघुपति करहिं जब सो तस तेहि छन होई।

रामचरित मानस के बाल कांड में भगवान विष्णु के रामावतार का कारण और भगवान की लीला का उद्देश्य समझाते हुए यहां भगवान शिव कहते है कोई भी इस भ्रम में न रहे कि वह सर्वज्ञानी है या कोई हमेशा मूर्ख ही रहेगा।

भगवान की जब जैसी इच्छा होती है तवह प्रत्येक प्राणी को वैसा बना देते है। इसलिए कभी किसी चीज का अहंकार नहीं करना चाहिए। जो अहंकार करते है वह समाज में कभी भी आगे नहीं बढ़ पाते।

राजा में होते है ये खास बांते

काम, क्रोध, मद, लोभ, सब, नाथ नरक के पंथ।

सब परिहरि रघुबीरहि, भजहुं भजहि जेहि संत।

विभीषण जी रावण को पाप के रास्ते पर आगे बढ़ने से रोकने के लिए समझाते है कि काम, क्रोध, अहंकार, लोभ आदि नरक के रास्ते पर ले जाने वाले है। काम के वश में होकर आपने जो देवी सीता का हरण किया है और आपको जो बल का अहंकार हो रहा है वह आपके विनाश का रास्ता है।

जिस प्रकार साधु लोग सब कुछ त्यागकर भगवान का नाम जपते है आप भी राम के हो जाए। मनुष्य को भी इस लोक में और परलोक में सुख, शांति और उन्नति के लिए इन पाप की ओर ले जाने वाले तत्वों से बचना चाहिए।

ऐसे लोग होते है महान आत्मा

जे न मित्र दुख होहिं दुखारी। तिन्हहि बिलोकत पातक भारी।

निज दुख गिरि सम रज करि जाना। मित्रक दुख रज मेरु समाना।।

रामचरित मानस में भगवान राम और सुग्रीव की मित्रता के संदर्भ में यह ज्ञान देती है कि मित्रता निभाने वाले की भगवान भी सहायता करते है। जो लोग मित्र या फिर दूसरों के दुख को देखकर दुखी नहीं होते, उन लोगों की मदद नहीं करते है।

ऐसे लोगों को देखने से भी पाप लग जाता है। जो लोग अपने दुख को भूलकर दूसरों की सहायता करते है ईश्वर स्वयं उसकी मदद करते है।

इस तरह के लोग होते है स्वार्थी

आगें कह मृदु बचन बनाई। पाछें अनहित मन कुटिलाई।।

जाकर चित अहि गति सम भाई। अस कुमित्र परिहरेहिं भलाई।

किष्किंधा कांड में श्री राम ने मित्रों के लक्षण बताए है। उन्होंने कहा कि अच्छा मित्र जीवन में बड़ी उपलब्धि है। जो सामने तो कोमल वचन कहता है और पीठ-पीछे बुराई करता है ऐसे लोगों से हमेशा दूरी बनाकर रखना चाहिए। क्योंकि ये स्वार्थी होते है।

भगवान राम अपने भाई लक्ष्मण से कहते है कि हे भाई जिसका मन सांप की चाल के समान टेढ़ा है ऐसे कुमित्र को तो त्यागने में ही आपकी भलाई है। सच्चा मित्र हमेशा स्पष्ट बात करता है। सच्चा मित्र आपको सही राय देता है। मित्रता में एक-दूसरे के प्रति खुला हृदय होना चाहिए।

इन चीजों को त्यागे

मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला। तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला।।

काम बात कफ लोभ अपारा। क्रोध पित्त नित छाती जारा।।

सब रोगों की जड़ मोह है। इस व्याधि से फिर और बहुत से शूल उत्पन्न होते है। जैसे काम, वात, लोभ, अपार कफ है और क्रोध पित्त है। जो सदा छाती जलाता रहता है। ऐसे लोगो जीवन में कुछ नहीं कर पाते। हमेशा आगे बढ़ने के लिए इन चीजों को त्यागना जरूर पड़ता है।

समाज के भलाई का करे काम

नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं। संत मिलन सम सुख जग नाहीं।।

पर उपकार बचन मन काया। संत सहज सुभाउ खगराया।।

जगत में दरिद्रता यानी गरीबी के समान कोई दुख नहीं है तथा संतो ंके मिलने के समान जगत में कोई सुख नहीं है। क्योंकि मन, वचन और शरीर से परोपकार करना ही संतों का सहज स्वभाव है। महान संत आपको अच्छे विचार देते है जिससे आप समाज की भलाई के लिए काम करते है।

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