करवा चौथ का व्रत करने वाले जाने विस्तार से पूजन विधि व सामग्री के विषय में

1

करवा चौथ का व्रत हर सुहागन स्त्री के जीवन में बहुत महत्वपूर्ण होता है। इस दिन महिलाएं पूरे दिन निर्जला रहकर व्रत करती है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष्ज्ञ की चतुर्थी तिथि को करवा चौथ का व्रत किया जाता है।

इस बार करवा चौथ का व्रत 4 नवंबर को किया जाएगा। इस लेख के माध्यम से हम करवा चौथ के महत्व व पूजन सामग्री, पूजन विधि की विस्तार से जानकारी देंगे।

ज्योतिषाचार्य एवं वास्तुविद मनोज तिवारी ने बताया कि करवा चौथ का व्रत बहुत ही हर्षोल्लास के साथ सुहागिन स्त्रियां करती है। जिन लड़कियों की शादी के बाद पहली करवा चौथ होती है उनके लिए यह दिन और भी खास हो जाती है।

इस व्रत को पूरे दिन बिना कुछ खाए-पीए निर्जला रहकर व्रत किया जाता है। करवा चौथ की पूजा करने का प्रावधान विशेष तौर पर रात्रि के समय चांद निकलने के बाद होता है।

इसलिए सुबह स्नानादि करके पूजा घर में भगवान के समक्ष पूजा करके व्रत प्रारंभ करें। यदि घर में सूर्योदय के पहले सरगी परंपरा है तो जल्दी उठकर सरगी खा ले।

सरगी में सास अपनी बहु को मेवा, फल और मीठी चीजें देती है। साथ ही में सास अपनी बहू को सुहाग का सामान भी देती है।

नवंबर माह में कौन-कौन से है व्रत-त्योहार, जाने विस्तार से

यह है पूजन विधि

करवा चौथ की थाली में रोली, महावर, लौंग, कर्पूर, जल का भरा हुआ टोटी वाला लोटा, प्रसाद, फूल, घी का दीपक, धूप बत्ती, श्रृंगार का सामान, दूर्वा, मिट्टी की करवा, उसमें भने के लिए चावल या मीठे बताशे, पूजा की सींक आदि।

इसके साथ ही करवा चैथ का कैलेंडर शिव-पार्वती और भगवान गणेश की प्रतिमाएं। इसके अलावा आप जो भी भोजन बनाएं उसे भी साथ में रखे। करवा चौथ का व्रत चंद्रमा को अघ्र्य देने के बाद पति के हाथ स ेजल पीकर तोड़ा जाता है।

इस दिन कथा पढ़ने का प्रावधान भी है। इसलिए अपने घर की परंपरा के अनुसार दिन या संध्या के समय करवा चौथ की कथा पढ़े या सुने। शाम की पूजा के लिए चंद्रमा निकलने के पहले ही सारी तैयारियां करके रख ले।

इस दिन सोलह श्रृंगार करने का बहुत महत्व होता है। पूजन से पहले गाय के गोबर लगाकर उस पर पीसे हुए चावल से चंद्रमा की आकृति बनाए। एक पीड़े पर भगवान शिव, माता पार्वती और गणेश जी की प्रतिमा स्थापित करे।

उसके बाद दीपक जलाकर पूजा प्रारंभ करे। चंद्रमा की आकृति पर तिलक करे। देवी-देवताओं को तिलक लगाए। लौंग कर्पूर जलाए। फल-फूल अर्पित करे। श्रृंगार की सभी सामग्री की भी पूजा करे। इसके बाद छलनी में दिया लेकर चंद्रमा का प्रतिबिंब देखे।

अपने पति का चेहरा देखे। चंद्रमा की आरती करे और हाथों में पूजा की सींक लेकर जल से चंद्रमा को अघ्र्य देते हुए सात परिक्रमा करे। पूजा सम्पन्न हो जाने के बाद अपने पति के हाथों से जल पीकर व्रत खोलें। घर के सभी बड़ों का आशीर्वाद ले।

1 COMMENT

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here