विजया एकादशी की तिथि को व्रत करने वाले कभी नहीं होते परास्त, जाने विस्तार से

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फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी विजया एकादशी (Vijiya Ekadashi 2021)के नाम से जानी जाती है। इस साल विजया एकादशी 9 मार्च को है। जैसा इस व्रत का नाम है वैसा ही इस व्रत को करने से फल प्राप्त होता है। ज्योतिषाचार्यों के मुताबिक इस व्रत को करने वाले सदैव विजय होते है। कभी भी परास्त नहीं होते है।

ज्योतिषाचार्य एवं वास्तुविद मनोज तिवारी ने बताया कि प्राचीन काल में कई राजा-महाराजा इस व्रत के प्रभाव से अपनी निश्चित हार को भी जीत में बदल चुके है। पुराणों में भी है वर्णनविजया एकादशी व्रत के बारे में पद्म पुराण और स्कंद पुराण में अति सुंदर वर्णन है। कहा जाता है कि जब जातक शत्रुओं से घिरा हो तब विकट से विकट परिस्थिति में भी विजया एकादशी के व्रत से जीत सुनिश्चित की जा सकती है।

कहा जाता है कि विजया एकादशी (Vijiya Ekadashi)का व्रत करने से कष्टों से मुक्ति मिलती हैं। विजया एकादशी व्रत करने वाले साधक के जीवन में शुभ कर्मों में वृद्धि, मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है और कष्टों का नाश होता है। इतना ही जो भी साधक इस एकादशी के व्रत को विधि-विधान और सच्चे मन से करता है वह भगवान विष्णु की कृपा का प्रात्र बन जाता है।

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भगवान राम ने किया था यह व्रत

कथा के मुताबिक वनवास के दौरान जब रावण ने सीता का हरण कर लिया था। तब भगवान राम ने रावण से युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए इस महाव्रत को किया था। इस व्रत के प्रभाव से ही श्रीराम चंद्र विजयी हुए थे। भगवान राम ने इस व्रत को धारण किया और सागर पर सेतु का निर्माण कर लंका पर चढ़ाई की।

विजया एकादशी की व्रत कथा

द्वापर युग में धर्मराज युद्धिष्ठिर को फाल्गुन एकादशी के महत्व के बारे में जानने की जिज्ञासा हुई। उन्होंने अपनी शंका भगवान श्री कृष्ण के सामने प्रकट की। भगवान श्रीकृष्ण ने फाल्गुन एकादशी के महत्व व कथा के बारे में बताते हुए कहा कि सबसे पहले नारद मुनि से ब्रम्हा जी से फाल्गुन कृष्ण एकादशी व्रत की कथा व महत्व के बारे में जाना था।

उनके बाद इसके बारे में जानने वाले तुम्ही हो। त्रेतायुग में जब भगवान श्री राम ने माता सीता के हरण होने के बाद रावण से युद्ध करने के लिए सुग्रीव की सेना को साथ लेकर लंका की ओर प्रस्थान किया तो लंका से पहले विशाल समुद्र ने रास्ता रोक लिया।

समुद्र में बहुत ही खतरनाक समुद्री जीव थे। जो वानर सेना को हानि पहुंचा सकते थे। चूंकि श्री राम नाव रूप में सुलझाना चाहते थे। उन्होंने लक्ष्मण से समुद्र पार करने का उपाय जानन चाहा तो लक्ष्मण ने कहा कि हे प्रभु वैसे तो आप सर्वज्ञ है फिर भी यदि आप जानना चाहते है।

तो मुझे भी स्वयं इसका कोई उपाय नहीं सुझ रहा लेकिन यहां से आधा योजन की दूरी पर वकदालभ्य मुनिवर निवास करते है उनके पास इसका कुछ न कुछ उपाय हमें अवश्य मिल सकता है। फिर क्या था भगवान श्री राम उनके पास पहुंच गए।

उन्हें प्रणाम किया और अपनी समस्या उनके सामने रखी। तब मुनि ने उन्हें बताया कि फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को यदि आप समस्त सेना सहित उपवास रखे तो आप समुद्र पार करने में तो कामयाब होंगे ही साथ ही इस उपवास के प्रताप से आप लंका पर भी विजय प्राप्त करेंगे।

समय आने पर मुनि वकदालभ्य द्वारा बताई गई विधि के मुताबिक भगवान श्री राम सहित पूरी सेना ने एकादशी का उपवास किया और राम सेतु बनाकर समुद्र को पार कर रावण को परास्त किया।

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