138 साल से सागौन के 24 स्तंभों पर खड़ा है मां दंतेश्वरी का मंदिर, जाने इतिहास

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शहर के आस्था का प्रमुख केन्द्र दंतेश्वरी मंदिर में तो भक्त बहुत जाते है। लेकिन उस मंदिर के इतिहास को कोई नहीं जानता है। मां दंतेश्वरी का दरबार इतना अद्भूत है कि वहां आने वाले भक्त बहुत ही आनंदित होकर जाते है।

मंदिर का इतिहास प्राचीन है। बताया जाता है कि 138 साल से सागौन के 24 स्तंभों पर खड़ा है। सीमेंट या चूना पत्थर की तरह दिखने वाले ये स्तंभ लकड़ी के है। जिस पर ओडिसा के कलाकारों ने आकर्षक नक्काशी की है।

संगमरमर की है मां की प्रतिमा मंदिर में

दंतेश्वरी माता की मूर्ति संगमरमर से निर्मित सिंहवाहिनी है। यहां लकड़ी से निर्मित भगवान विष्णु की प्रतिमा भी विराजमान है। जो देखने में काफी आकर्षक व सुंदर है।

वारंगल के राजाओं ने 1880 में कराया था निर्माण

शहर के दंतेश्वरी मंदिर को वारंगल के राजा हीराला चितेर ने 1880 में बनवाया था। उस समय इस इलाके में उनका राठपाठ था। वारंगल के राजाओं की कुलदेवी मां दंतेश्वरी थी और वे विष्णु भक्त भी थे।

इससे पहले बस्तर में नागवंशी राजाओं का शासन रहा। पंडित रामचंद्र रथ ने बताया कि पहले बस्तर की ईस्ट देवी मावली माता थी। इसी वजह से दशहरे के समय मावली परघाव किया जाता है।

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1958 में स्थापित हुई थी मां सरस्वती की प्रतिमा

दंतेश्वरी मंदिर में मां सरस्वती की प्रतिमा भी स्थापित है। इसकी स्थापना 1958 में महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव ने करवाई थी। गौरतलब है कि महाराज भंजदेव की कुलदेवी काली माता थी।

प्रवेश द्वार में विष्णु के दस अवतार

दंतेश्वरी मंदिर के मुख्य द्वार स्थित दरवाजे में विष्णु भगवान के 10 अवतारों का वर्णन किया गया है और उसके ऊपर गरूड़ का चित्र बना हुआ है।

पंडित ने बताया कि यह मंदिर पहले लकड़ियों से बना था बाद में इसका पुन निर्माण कर टाइल्स आदि लगाए गए।

माता की जो अन्य मूर्ति स्थापित की गई है वह अष्ट धातु की है। शारदीय नवरात्रि में पूर्व में रखकर पूजा की जाती है।

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मंदिर निर्माण के पीछे है किवदंती

इसे शक्तिपीठ माना जाता है। मंदिर के पीछे एक प्राचीन कहानी है कि सतयुग में जब राजा दक्ष ने यज्ञ कराया तो उन्होंने भगवान शंकर को इसमें आमंत्रित नहीं किया। इस पर भगवान शंकर क्रोधित हो गए और उन्होंने तांडव नृत्य किया।

चूंकि सती राजा दक्ष की पुत्री थी तो उन्होंने अपने पति के इस अपमान से क्षुब्द होकर अपने पिता के यज्ञ कुंड में खुद की आहूति दे दी थी। जब भगवान शंकर को इस बारे में पता चला तो वह सती का शव अपनी गोद में लेकर पूरे ब्रम्हांड की परिक्रमा करने लगे।

भगवान शिव के इस क्रोधित रूप से प्रलय की आशंका को देखते हुए भगवान विष्णु ने चक्र चलाया और सति के शव को खंडित कर दिया। इस दौरान जिन-जिन स्थलों पर सती के अवशेष गिरे वहां शक्ति पीठों की स्थापना हुई। यहां पर भी मां सती के दांत गिरे थे।

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