संत पाराशर मंदिर में शुरू हुई श्रीमद भागवत महापुराण की कथा

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बिलासपुर.कथा के प्रथम दिवस वेदी पूजन व व्यास पूजन गोपाल की पुत्री व दामाद मनीष ऋतु तिवारी द्वारा किया गया। व्यासपीठ आसीन अमर कृष्ण शुक्ला जी ने मंगलाचरण करके तुलसीदास जी का जीवन परिचय दिया।

हिन्दू धर्म मे रामायण का महत्वपूर्ण स्थान है। इसमें भगवान विष्णु के रामावतार को वर्णित किया है। अमर शुक्ला ने तुलसीदास जी का परिचय देते हुए बताया कि

महान कवि तुलसीदास जी की प्रतिभा किरणों से ना केवल हिन्दू समाज और भारत बल्कि समस्त संसार अलौकिक हो रहा है।

इन्हें महर्षि वाल्मीकि का अवतार भी माना जाता है। उनका जन्म श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को हुआ था। उनकी पत्नी का नाम रत्नावली था।

पत्नी ने तुलसीदास से कहा हाड़ मांस को देह मम, तापर जितनी प्रीति। तिसु आधो जो राम प्रति, अवसि मिटिहि भवभीति।।

अर्थात् जितनी आसक्ति मेरे हांड़.मांस की देह से है, उसकी आधी भी भगवान राम के प्रति होती तो भव सागर पार हो जाते।

आचार्य अमर कृष्ण शुक्ला ने श्री राम के गुणों का वर्णन किया जो आज युवा पीढ़ी को सीखना चाहिए क्योंकि, आज की युवा पीढ़ी भटकती जा रही पाश्चात्य संस्कृति के पीछे आंख बंद कर के भाग रही है,

और हमारे संस्कार एसंस्कृति और नैतिक मूल्यों को भूलती जा रही है। जबकि विदेश में हमारे धर्म ग्रंथो की शिक्षा दी जा रही है। और भारत मे भगवान का नाम लेने में बच्चों को शर्म आती है।

राम के गुणों का बखान करते हुए कहा कि जिसके हृदय में राजा राम आकर बैठ जाएं उसके तो तीनों लोक हर्षित हो जायेंगें। श्री राम तो मर्यादा पुरुषोत्तम हैं।

हमें जीवन में उनके व्यक्तित्व को धारण करना चाहिए। उन्होंने हर रिश्ते के लिए उदाहरण प्रस्तुत किया है। रामचरित मानस रूपी नाव पर हम यदि सवार हो गए तो इस भवसागर से पार होना निश्चित है।

कृष्ण की लीला से हम सीख सकते हैं लेकिन अनुसरण नहीं कर सकते क्योंकि उनकी कुछ लीला ऐसी है जो एक साधारण इंसान कर भी नही सकता।

लेकिन श्री राम का चरित्र तो ऐसा है जिसे हमें अपने जीवन मे उतारना चाहिए। गोस्वमी जी ने तो कहा है कि ष्कहहि सुनहि अनुमोदन करही। राम के चरित्र को तो गाना चाहिए, सुनना चाहिए, अनुमोदन अनुसरण करना चाहिए।

हर कोई इस मार्ग पर चल भी नही सकता तुलसीदास जी ने तो कहा जा पर कृपा राम की होई ता पर कृपा करही सब कोई हमारे चार प्रमुख ग्रंथ है रामायण जो हमे जीना सिखाती है,

महाभारत रहना सिखाती है, गीता हमें कर्म करना और भागवत जी हमे मरना सिखाती है। रामायण हमे जीना सिखाती है। आज हमें जीना ही सीखना ज़रूरी है।

रामचरितमानस का तो हर चरित्र ही अनुसरणीय है। इस बीमारी से लड़ने के लिए सकारात्मक विचार रखना अतिआवश्यक है जिसमें भगवान का नाम, उनकी कथा, सत्संग ,संकीर्तन सर्वोत्तम उपाय है।

ईश्वर पर विश्वास ही नकरात्मकता को समाप्त कर देता है। कथा प्रसंग में तुलसीदास जी द्वारा किया मंगलाचरण का वर्णन , सती चरित्र का बहोत सुंदर चित्रण किया।

रामचरितमानस में 7 कांड हैं और उन्हीं के अंतर्गत इस ग्रंथ में 27 श्लोक, 4608 चौपाई, 1074 दोहे, 207 सोरठा और 86 छन्द हैं।

चौपाइयां केवल शब्द ही नहीं हैं बल्कि मानव कल्याण का साधन भी है। श्री राम की वंदना की चौपाई सुनाते हुए कहा बंदउँ नाम राम रघुबर को।

श्री राम के नाम की महिमा का गुणगान करते हुए राम से पहले राम के नाम की वंदना की । राम से बड़ा राम का नाम। राम का तो नाम लेने मात्र से सब कार्य सिद्ध हो जाते हैं।

राम नाम की महिमा में राम सेतु निर्माण का प्रसंग सुनाया ए कि जब सीता जी को लेने लंका जाने के लिए समुद्र पार करने हेतु सेतु का निर्माण करना था तो वानर सेना द्वारा पत्थर पर राम नाम लिख कर समुद्र में डाले जा रहे थे।

जिन पर राम का नाम था वो तो तैर रहे थे और वहीं जो पत्थर श्री राम स्वयं डाल रहे थे वो डूब जाते थे।

इसके पीछे छुपे गूढ़ रहस्य को भी अमर शुक्ला ने भक्तो को बताया कि क्यों राम जी द्वारा डाले गए पत्थर डूब रहे थे

क्योंकि जिनको भगवान राम स्वयं पानी मे डाल दें, अपने से दूर कर दें छोड़ दें , वो तो डूब ही जायेगा। लेकिन जो राम का नाम लेगा जिस के हृदय में राम है वो तो इस भवसागर से पार हो जाएगा।

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