दान का महापर्व छेरछेरा मनाने के पीछे की जाने कथा

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छेरछेरा का पर्व छत्तीसगढ़ में दान का सबसे बड़ा पर्व माना जाता है। इस दिन हर घर में बच्चे-बड़े पहुंचकर छेरछेरा मांगते है और लोग उन्हें दान कर पुण्य अर्जित करते है। इस पर्व को मनाने के पीछे की कथा बाबू रेवाराम की पांडुलिपियों से बताया गया है।

कल्चुरी राजवंश के कोसल नरेश कल्याणसाय व मंडल के राजा के बीच विवाद हुआ और इसके बाद तत्कालीन मुगल शासक अकबर ने उन्हें दिल्ली बुला लिया। कल्याणसाय 8 वर्षों तक दिल्ली में ही रहे। वहां उन्होंने राजनीति व युद्धकला की शिक्षा ली और निपुणता हासिल की।

8 वर्ष बाद कल्याणसाय, उपाधि एवं राजा के पूर्ण अधिकार के साथ अपनी राजधानी रतनपुर वापस पहुंचे। जब प्रजा को राजा के लौटने की खबर मिली तब प्रजा पूरे जश्न के साथ राजा के स्वागत में राजधानी रतनपुर आ पहुंची।

प्रजा के इस प्रेम को देखकर रानी फुलकेना द्वारा रत्न और स्वर्ण मुद्राओं की बारिश करवाई गई। रानी ने प्रजा को हर वर्ष उसी तिथि पर आने का न्योता दिया। तभी से राजा के उस आगमन को यादगार बनाने के लिए छेरछेरा पर्व की शुरुआत की गई।

राजा जब घर आए तब समय ऐसा था जब किसान की फसल भी खलिहानों से घर को आई और इस तरह जश्न में हमारे खेत और खलिहान भी जुट गए।

लोक पंरपरा के अनुसार पौष महीने की पूर्णिमा को प्रतिवर्ष छेरछेरा का त्योहार मनाया जाता है। गांव के बच्चे, युवक घर-घर जाकर डंडा नृत्य करते है और अन्न का दान मांगते है। धान मिसाई हो जाने के चलते गांव में घर-घर धान का भंडार होता है।

जिसके चलते लोग छेर छेरा मांगने वालों को दान करते है। छेरछेरा माई छेरछेरा कोठी के धान ला हेरते हेरा…यही आवाज प्रदेश के ग्रामीण अंचल में गूंजती है और दान के रूप में नगद व धान का दान किया जाता है।

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