पुरुषोत्तम मास में पद्यमिनी एकादशी व्रत सबसे पुण्यकारी, जाने विस्तार से

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अधिक मास में एकादशी का विशेष महत्व बताया गया है। अधिक मास में पड़ने वाली एकादशी को पद्मीनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। पद्मिनी एकादशी का व्रत कब है इस लेख के माध्यम से बताएंगे।

पंचाग के अनुसार इस समय अधिक मास चल रहा है। आश्विन मास की शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी की तिथि को पद्मिनी एकादशी कहा जाता है।

एकादशी व्रत में भगवान विष्णु की पूजा की जाती है और अधिक मास भगवान विष्णु को समर्पित है। इसलिए एकादशी का महत्व भी बढ़ जाता है।

सभी व्रतों में श्रेष्ठ है एकादशी का व्रत

पौराणिक कथाओं के अनुसार एकादशी का व्रत सभी व्रतों में श्रेष्ठ माना गया है। महाभारत की कथा में भी एकादशी व्रत का वर्णन आता है।

भगवान विष्णु के अवतार भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं युधिष्ठिर और अर्जुन को एकादशी के व्रत के महात्म के बारे में बताया था।

एकादशी का व्रत मोक्ष प्रदान करता है। सभी प्रकार के पापों से मुक्ति दिलाता है। एकादशी का व्रत सभी मनोकामनाओं को भी पूर्ण करता है।

27 को है पद्मिनी एकादशी

प्ंचाग के मुताबिक 27 सितंबर को पद्मिनी एकादशी का व्रत है। इस एकादशी को बहुत ही विशेष माना गया है। इसलिए इस व्रत को विधि पूर्वक करना चाहिए। तभी भगवान विष्णु का आशीर्वाद मिलेगा।

पद्मिनी एकादशी की पूजा व व्रत विधि

एकादशी की तिथि का आरंभ होते ही इस व्रत का आरंभ हो जाता है। एकादशी की तिथि के दिन सुबह स्नानादि से निवृत्त होकर भगवान विष्णु की विधि पूर्वक पूजा आरंभ करनी चाहिए।

इस दिन व्रत करके विष्णु पुराण का पाठ करना चाहिए। इस व्रत के सभी प्रहरों में पूजा का विधान बताया गया है। इसलिए इस व्रत को सबसे कठिन व्रतों में से एक माना गया है।

पद्मिनी एकादशी व्रत का पारण द्वादशी की तिथि में करे। इस व्रत का पारण भी विधि पूर्वक करना चाहिए। तभी इस व्रत का पूर्ण लाभ प्राप्त होता है। व्रत समाप्त करने के बाद भोजन ग्रहण करना चाहिए।

पद्मिनी एकादशी व्रत की कथा

पौराणिक कथा के अनुसार त्रेतायुग में एक राजा थे जिनका नाम कीतृवीर था। उनकी कई रानियां थी लेकिन किसी को कोई पुत्र नहीं था। जिस कारण राजा और उनकी सभी रानियां दुखी और परेशान रहती थी।

राजा को किसी ने सलाह दी कि वे अपनी रानियों के साथ संतान प्राप्ति के लिए कठोर तपस्या करे। राजा ने इस सलाह को मानते हुए कई वर्षों तक कठोर तपस्या की।

कठोर तपस्या के कारण राजा का शरीर कमजोर हो गया। राजा कंकाल की तरह दिखाई देने लगा। कठोर तपस्या के बाद भी राजा को फल प्राप्त नहीं हुआ।

तब एक रानी ने देवी अनुसुईया से इसका उपाय पूछा तब देवी ने रानी को पुरुषोत्तम मास में शुक्लपक्ष की एकादशी व्रत करने के लिए कहा।

व्रत की समाप्ति पर भगवान प्रकट हुए और वरदान दिया । कुछ समय बाद रानी ने एक पुत्र को जन्म दिया जो कार्तवीर अर्जुन कहलाया। यह बालक आगे चलकर अत्यंत पराक्रमी राजा बना।

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