छठ पूजा के तीसरे और 4 थे दिन संध्या और उषा अघ्र्य का जाने महत्व

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छठ पूजा चार दिन का माना जाता है जिसमें प्रत्येक दिन का विशेष महत्व माना जाता है। खरना के बाद संध्या पूजा और उषा पूजा की विधि होती है।

छठ पूजा में सूर्य देव और छठी मैया की पूजा का प्रचलन है और उन्हें अघ्र्य देने का विधान है। छठ पूजा का व्रत महिलाएं अपनी संतान की रक्षा और पूरे परिवार की सुख-शांति का वर मांगने के लिए करती है।

मान्यतानुसार इस दिन निःसंतानों को संतान प्राप्ति का वरदान देती है छठ मैया। 18 नवंबर को नहाए खाए मनाया गया। फिर दूसरे दिन 19 नवंबर को खरना की विधि की गई। तीसरे दिन 20 नवंबर को संध्या अघ्र्य की विधि की जाती है।

संध्या अघ्र्य का महत्व

षष्ठी के दिन ही छठ पूजा और पर्व रहता है। इस दिन संध्या अघ्र्य का महत्व है। इस दिन कार्तिक शुक्ल की षष्ठी होती है।

संध्या षष्ठी को अघ्र्य यानी संध्या के समय डूबते सूर्य को अघ्र्य दिया जाता है और विधिवत पूजन किया जाता है। इस समय सूर्य अपनी पत्नी प्रत्यूषा के साथ रहते है।

इसलिए प्रत्यूषा को अघ्र्य देने का लाभ मिलता है। कहते है कि शाम के समय सूर्य की आराधना से जीवन में सम्पन्नता आती है।

शाम को बांस की टोकरी में ठेकुआ, चावल के लड्डू और फल रखकर सूपा को सजाया जाता है। सूर्य देव को डूबते हुए अघ्र्य देते है।

इसी दौरान सूर्य को जल एवं दूध चढ़ाकर प्रसाद भरे सूप से छठी मैया की पूजा भी की जाती है। बाद में रात्रि को छठी माता के गीत गाए जाते है और व्रत की कथा सुनी जाती है।

उषा अघ्र्य का महत्व

उषा अघ्र्य यानी इस दिन सुबह सूर्योदय से पहले नदी के घाट पर पहुंचकर उगते सूर्य को अघ्र्य देते है। इस बार 21 नवंबर को उषा अघ्र्य की विधि पूरी करते हुए व्रत को पूर्ण किया जाएगा। यह तिथि सप्तमी की होती है।

इस दिन अघ्र्य के बाद व्रत का समापन किया जाता है। जिसे पारण कहते है। अंतिम दिन सूर्य को वरुण वेला में अघ्र्य दिया जाता है। यह सूर्य की पत्नी उषा को दिया जाता है।

इससे सभी तरह की मनोकामनाएं पूर्ण होती है। पूजा के बाद व्रती कच्चे दूध का शरबत पीकर या अदरक व गुड़ ग्रहण कर व्रत का पारण प्रसाद खाते हुए करता है। जिसे पारणा कहते है।

संध्या व उषा अघ्र्य का मुहूर्त

इस दिन सूर्योदय सुबह 6 बजकर 48 मिनट पर होगा और सूर्यास्त 5 बजकर 26 मिनट पर होगा। 21 नवंबर को उगते सूर्य को अघ्र्य देंगे इस दिन सूर्योदय सुबह 6 बजकर 49 मिनट पर होगा।

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