बिलासपुर.सोशल मीडिया फेसबुक के माध्यम से रीना संजीव श्रीवास्तव परिवार द्वारा आयोजित कथा के सप्तम दिवस कथा के माध्यम से व्यासपीठ आसीन अमर शुक्ला ने अच्छी और बुरी संगत का प्रभाव बताया ।

कैकई राम को अपने पुत्र भरत से भी अधिक स्नेह करती थीं लेकिन दासी मंथरा की बुरी संगत , सोच व गलत बातों में आकर राम के लिए 14 वर्ष का वनवास मांग लेती है। जिसके दुष्परिणाम कैकई को ही नही अपितु पूरे अयोध्या वासियों को भुगतने पड़े।

भले वो प्रभु की लीला का ही हिस्सा हो। किंतु राम को वनवास जाना पड़ा और राम के वियोग में दशरथ जी की मृत्यु हो गयी। जिस भरत को राजगद्दी पर बैठने के लिए ये सब किया गया उस भरत ने महल में रह कर भी राम के सेवक की तरह वनवासी की तरह जीवन जीया।

इसीलिए हमे अच्छी संगति में रहना चाहिये ताकि नकारात्मकता का हम पर प्रभाव ना पड़ सके। लक्ष्मण . माता सुमित्रा संवाद में जब लक्षमण जी माँ से राम के साथ वन जाने की आज्ञा लेने आते हैं तो सुमित्रा जी बहोत ही सुंदर बात कहती हैं

जो सुमित्रा जैसी माँ ही कह सकती है कि राम को वनवास तो लक्ष्मण तेरे कारण ही मिला है ताकि तुम्हे प्रभु राम व माता सीता की सेवा करने का सुख प्राप्त हो सके। आज की कथा में ऐश्वर्य से बढ़ कर रिश्तों को महत्व देने की शिक्षा प्रदान की।

भाइयों का ऐसा प्यार जहां लालचए गुस्सा या विश्वासघात घर नहीं कर पाया। जोकि आज की पीढ़ी के लिये बड़ा उदाहरण है। एक और जहां लक्ष्मण ने 14 साल भाई राम के साथ वनवास किया एवही दूसरे भाई भरत ने राजगद्दी को ठुकरा कर वन ना जाकर भी सब कुछ त्याग दिया ।

साथ ही पत्नी धर्म को भी वर्णित किया की महलों में पली बढ़ी सीता जी ने वनवास ना मिलने पर भी पत्नी धर्म निभाते हुए सब राज सुख छोड़कर राम के साथ वन गमन किया ।यह है हमारी संस्कृति ,हमारी रामकथा यह भोग नहीं त्याग की कथा है ।

जहां त्याग की प्रतियोगिता चल रही है , और विचित्र और उत्तम बात यह है कि इसमें सभी प्रथम है कोई पीछे नहीं रहा। चारों भाइयों का प्रेम और त्याग एक दूसरे के प्रति अलौकिक है इसीलिए कहा गया कि रामायण जीवन जीने की कला सिखाती है।

जीवन मे हमे अपने कर्तव्यों का पालन करने की त्याग, प्रेम , सम्मान ,एक आदर्श व्यक्तित्व की सबसे उत्तम शिक्षा प्रदान करती है। वनवास जाने के समय अयोध्या वासियों के प्रेम भाव को बाहोत भावुक चित्रण किया।

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