सोलह सोमवार के व्रत की जाने महिमा, पूरी होती है प्रत्येक मनोकामना

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सोमवार का दिन देवों के देव महादेव को समर्पित है। इस दिन भगवान भोलेनाथ की पूजा.अर्चना की जाती है। भगवान शंकर को शिवए भोलेनाथए महादेव जैसे कई नामों से जाना जाता है।

एेसा कहा जाता है कि भगवान विष्णु जब देवशयनी के दौरान पाताल लोक में शयन करते है तब भगवान शंकर ही उनके कार्यों का निर्वहन कर सृष्टि का कल्याण करते है। देव शयनी के बाद ही सावन का महीना शुरू होता है।

इस दौरान शिव पूजन करना बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। इसी दौरान जो भी साधक महादेव को प्रसन्न करना चाहता है वह सोलह सोमवार का व्रत करता है। आखिर ये सोलह सोमवार व्रत क्या हैघ् इसी का महत्व इस लेख के माध्यम से जानेंगे।

सोलह सोमवार व्रत की कथा

सोलह सोमवार की व्रत की कथा शिवपुराण में कई बताई गई है। उसमें से एक कथा है जिसमें माता पार्वती द्वारा अमरावती नामक नगरी के सुंदर शिव मंदिर में विराजमान होने के दौरान वहां के पुजारी को श्राप देने की है।

जिसमें विस्तार से कथा इस प्रकार है। अमरावती नामक नगरी के राजा ने सुंदर शिव मंदिर बनवाया था। जहां पर माता पार्वती भगवान शंकर के साथ रहते थे। एक दिन माता पार्वती शिव जी के साथ चौसर खेल रही थी।

तभी वहां का पुजारी आया तब माता पार्वती ने पूछा की पुजारी जी बताईए जीत किसकी होगीए तब पुजारी ने महादेव के जीत होने की बात कह दी। अंत में जीत माता पार्वती की हुई।

तब माता पार्वती ने पुजारी जी को बिना सोचे समझे मिथ्या वचन कहने के कारण कोढ़ी होने का श्राप दे दिया। इस श्राप से पीडि़त पुजारी जी को स्वर्ग से आए अप्सराओं ने सोलह सोमवार व्रत की महिमा बताई।

उसी के मुताबिक पुजारी ने सोलह सोमवार तक महादेव की पूजा.अर्चना की। महादेव की कृपा से कोढ़ से मुक्त हो गए। तब माता पार्वती पुनरू उस शिव मंदिर में पधारी और

पुजारी को निरोग होने का कारण पूछा तब पुजारी ने सोलह सोमवार के व्रत की महिमा बताई। माता पार्वती ने भी व्रत किया और अपना मनोरथ पूर्ण किया।

इसी तरह से जो भी इस व्रत को सच्चे हृदय व भक्ति भाव से करता है उसकी समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती है। व्रत का महत्व इस व्रत का अति विशेष महत्व बताया गया है। इसे कुंवारी कन्याएं अधिक करती है।

एेसी मान्यता है कि इस व्रत को करने से व्यक्ति की यथा शीघ्र शादी हो जाती है। इसके अलावा हर उम्र के लोग इस व्रत को कर अपनी मनोकामना भगवान से मांग सकते है।

इस व्रत को सावन माह में शुरू करना सबसे उत्तम माना जाता है। इसके अलावा मार्गशीर्ष यानी अगहन माह में भी इसे शुरू कर सकते है। 16 सोमवार के बाद 17 वें सोमवार को इसका उद्यापन विधि.विधान से करके भगवान से क्षमायाचना करनी चाहिए।

भोग के होते है तीन हिस्से

महादेव को सोलह सोमवार के दिन उनकी पार्थिव शिवलिंग बनाकर पूजा करना उत्तम माना जाता है। इस दौरान पंच द्रव्यों से उनका अभिषेक शृंगार किया जाता है।

इसके बाद बेल पत्रए इत्रए पुंगी फलए लौंग इलायचीए धूपए दीप के साथ पूजन किया जाता है। चुरमा का भोग अर्पित किया जाता है।

इसमें चुरमा का भोग निश्चत मात्रा में ही तैयार किया जाता है। जिसे तीन हिस्से में बांटा जाता है। पहला हिस्सा भगवान शंकरए दूसरा नंदी का व तीसरा हिस्सा स्वयं के लिए होता है। उसे परिवार के लोगों को भी बांटा जाता है।

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