श्री कृष्ण जन्म की कथा सोशल मीडिया पर सुनकर भाव-विभोर हुए श्रद्धालु

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बिलासपुर. श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान रासधारा के चतुर्थ दिवस की कथा मे अमर कृष्ण शुक्ला जी ने जड़ भरत, अजामिल व्याख्यान ,प्रहलाद चरित्र, वामन अवतार, राम जन्म व कृष्ण जन्म की कथा सुनाई।

उन्होंने बताया कि ईश्वर कहते हैं कि धर्म अनेक हो सकते हैं, स्थान अलग हो सकते हैं, नाम अलग हो सकते हैं किंतु सब स्थान में मैं समभाव से विराजमान हूं, बस भाव से कोई पुकारके तो देखें ।

सबसे बड़ी बात वह तो हम जीवो के हृदय में विराजमान हैं , और हम उनको सारी दुनिया में खोजते हैं, जिस दिन ईश्वर के प्रति प्रेम , एक निष्ठ भाव उत्पन्न हो गया उसी दिन भगवान हमारे हृदय से प्रकट होकर हमारे समक्ष आ जाएंगे।

मोको कहां ढूंढे रे बंदे मैं तो तेरे पास रे, ना मैं मंदिर ना मैं मस्जिद ना काबे कैलाश रे। प्रहलाद चरित्र में भी यही ज्ञान दिया कि किस तरह असुर कुल में जन्म लेने के बाद भी प्रहलाद प्रभु भक्ति में लीन थे और ईश्वर में अपने दृढ़ विश्वास से भगवान को खम्ब से प्रकट कर दिया।

ईश्वर को अपने इस परम भक्त के विश्वास को बनाए रखने और उसकी रक्षा के लिए नरसिंह अवतार लेना पड़ा। मानवता का प्राण है प्रेम , जिसके हृदय में प्रेम , दया भाव नहीं वह व्यक्ति मानव नहीं।

रामहि केवल प्रेम पियारा ईश्वर तो हमारे प्रेम के भूखे हैं , वो तो हमारे प्रेमभाव से ही रीझ जाते हैं। रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय, हीरा जैसा जन्म यह कौड़ी बदले जाए संत कबीर के इस दोहे की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि मनुष्य इस संसार में बिना कोई

कर्म किए रात्रि सो के और दिन खाकर व्यर्थ ही व्यतीत कर रहे हैं, ईश्वर ने यह मनुष्य मानव जीवन हमें प्रदान किया उसका सदुपयोग नहीं करते । इस अमूल्य मनुष्य शरीर और इस जन्म को व्यर्थ गंवा रहे हैं।

कृष्ण जन्म का वर्णन करते हुए बताया कि भगवान ने अपने भक्तों को संवारने के लिए किस तरह देवकी वसुदेव जी की आठवीं संतान के रूप में भादो मास कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि बुधवार को मथुरा के कारावास में जन्म लिया।

ईश्वर के आशीर्वाद से वसुदेव जी ने सब बेडियो और सब बंधनों से मुक्त हो कृष्ण भगवान को टोकरी में लेकर गोकुल में सुरक्षित नंद बाबा के पास पहुंचाया है। इस लीला में भी एक शिक्षा छिपी है कि जो व्यक्ति माया को अपने सर पर रखता है

वह तो बंधनों में बंधा रहता है और जो अपने सर पर मायापति को रखता है वह सब बेड़ी बंधनों से मुक्त हो जाता है। वंदन हमारे सब बंधनों को खोल देता है।

इसलिए हमेशा हमें प्रभु का वंदन करते रहना चाहिए। ईश्वर तो कहते हैं अहम भक्त पराधीनम। ईश्वर तो भक्तों के लिए कुछ भी करने को तैयार है । अपने धन से, परिश्रम से इस संसार में प्रयास से कुछ या थोड़ा कुछ या बहुत कुछ प्राप्त हो सकता है किंतु यदि प्रभु के भक्त बन गए तो ईश्वर की कृपा से हमें सब कुछ मिल सकता है ।

फिर हमें मांगना नहीं पड़ता प्रभु स्वयं ही हमें सबकुछ प्रदान कर देते हैं। अपनी भक्ति अपने प्रेम भाव से प्रभु को हम अपने बंधन में बांध सकते हैं। जीवन उसी का सार्थक है जिसके जीवन में ईश्वर की भक्ति आ जाए।

नंद के आनंद भयो जय कन्हिया लाल की समस्त भक्त भजनों पर आनंदित हो झूमते रहे और कृष्ण जन्म की मनमोहक झांकी का आनंद लिया। खूब बधाई लुटाई गयी ।

बच्चों को हमारे सनातन ग्रंथों की शिक्षा भी प्रदान करने की शिक्षा दी । जिससे बच्चे हमारे राम कृष्ण के चरित्रों से संस्कार सीखें। रामायण भागवत जी भटकाती नही अपितु भटके हुए को सही राह दिखाती है।

जब तक हमारे जीवन के महाभारत चलती रहेगी भागवत जी हमारे जीवन मे नही आ सकती। मन हमारे बस में है हम मन के बस में नहीं है

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