भगवान परशुराम का जन्मोत्सव है 14 मई को, जाने पिता के आज्ञाकारी पुत्र होने की कथा

The birth anniversary of Lord Parshuram is on 14 May, the story of the father being obedient son
भगवान परशुराम का जन्मोत्सव है 14 मई को, जाने पिता के आज्ञाकारी पुत्र होने की कथा

तनाशाही क्षत्रियों के वंश का नाश करने वाले भगवान परशुराम का जन्मोत्सव 14 मई को मनाया जाएगा। ज्योतिषाचार्य एवं वास्तुविद मनोज तिवारी ने बताया कि भगवान विष्णु के छठे आवेश अवतार परशुराम की जयंती वैशाख शुक्ल तृतीया को आती है।

इस दिन को उत्सव के रूप में हिन्दू धर्म में मनाया जाता है। यह दिन खास होता है क्योंकि भगवान परशुराम का जन्मोत्सव होता है। इस दिन पूजा-अर्चना व दान का विशेष महत्व होता है। इस लेख में भगवान परशुराम के आज्ञाकारी पुत्र होने का विस्तार से वर्णन करेंगे।

पिता के आज्ञाकारी थे परशुराम

परशुराम जी से जुड़ी कई कथाएं प्रचलित है। लेकिन एक सबसे ज्यादा प्रचलित कथा है जो भगवान परशुराम की पितृ और मातृ भक्ति को दर्शाती है। कथा के मुताबिक परशुराम के पिता महर्षि जमदग्रि और माता रेणुका अपने पांच पुत्रों रक्तवान, सुखेण, वसु, विश्वनाथ और परशुराम के साथ जानापाव कुटी में रहते थे।

एक दिन माता रेणुका नित्य के अनुसार नदी पर स्नान कर जल लाने के लिए गई थी। माता रेणुका इतनी पतिव्रता थी कि वे अक्सर गीले घड़े में पानी भरकर ले आया करती थी और उनकी पति भक्ति के कारण कभी भी घड़ा गलता नहीं था। एक बार जब वे नदी पर गई तो वापस लौटते समय उनकी नजर राजा चित्ररथ पर पड़ी जो वहां स्नान करने आए थे।

उनकी सुंदरता के प्रति क्षण भर के लिए माता रेणुका आसक्त हो गई और उसी क्षण उनका घड़ा टूटकर बिखर गया। जैसे ही घड़ा टूटा माता बिलख-बिलख कर रोने लगी कि ये मुझसे क्या अपराध हो गया। इधर माता रेणुका को आने में बहुत समय लगा तो महर्षि जमदग्रि ने अपने तपोबल से अपनी पत्नी के इस आचरण को जान लिया।

अपनी पत्नी के इस आचरण से उन्हें बहुत क्रोध आया और उसी क्रोध में आकर उन्होंने एक-एक कर अपने सभी पुत्रों को ये आदेश दिया कि वे जाए और अपनी माता का शिश काटकर ले आए। परशुराम से बड़े चारों भाईयों ने मातृप्रेम के चलते पिता की इस आज्ञा का पालन करने से मना कर दिया।

गुस्से में आकर पिता ने चारों पुत्रों को उसी क्षण पाषाण का बना दिया। परशुराम से जब पिता ने कहा कि मां का शिश काटकर ले आओ तो उन्होंने पिता की आज्ञा को मानते हुए वहीं किया। पुत्र परशुराम के पिता प्रेम को देखकर महर्षि प्रसन्न हुए और उन्हें वरदान मांगने को कहा। तब परशुराम ने अपनी मातृ भक्ति का परिचय देते हुए पिता से तीन वर मांगे।

ये है वो तीन वर

-माता रेणुका को पुनः जीवनदान दे दीजिए क्योंकि मातृ हत्या का पाप लेकर मैं जी नहीं सकता, और उनकी स्मृति में से ये घटना हटा दीजिए।

-मेरे सभी भ्राताओं के शरीर में चैतन्यता लौटा दीजिए।

-मुझे ये वरदान दीजित कि कोई भी शत्रु मुझे युद्ध में हरा न पाए।

पिता के वरदान से हुए सफल

इस प्रचलित कथा के मुताबिक भगवान परशुराम को पिता ने ये तीनों वर दिए। आगे चलकर विष्णु के अवतार भगवान परशुराम ने महाबलशाली अत्याचारी क्षत्रिय राजा सहस्त्रबाहु का वध कर उसके अत्याचारों से जनमानस को आजाद किया। भगवान परशुराम की जन्मस्थली जानापाव में दर्शन कर भक्तजन उनसे शस्त्र विद्या और बाहुबल का आशीर्वाद प्राप्त करते है।

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