हिन्दू धर्म में दस पक्षियों को माना जाता है पवित्र, जाने पक्षियों के बारे में

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हिन्दू धर्म में देवी-देवताओं को जितना महत्व दिया जाता है। उतना ही प्रकृति से जड़े हुए पशु-पक्षियों, पेड़-पौधों व वनस्पतियों को भी महत्व दिया जाता है। प्रकृति में इन सभी को होना कितना जरूरी है।

यह बात हमारे पूर्वज भी जानते थे। इस वजह से आज तक इनकी रक्षा के उद्देश्य से इनकी पूजा-अर्चना का विधान बनाया गया है। इस लेख के माध्यम से हम उन दस पक्षियों के विषय में बताएंगे। जो हमारे धर्म में पवित्र माने गए है।

इसके अलावा हिंदू धर्म में ऋषियों और मुनियों ने यह जाना कि कौन से पक्षी में क्या रहस्य छिपा हुआ है। प्रत्येक पक्षी की खासियत होती है। जिसके विषय में विस्तार से जानकारी देंगे।

ये है वो दस पक्षी

हंस, मोर, कौआ, उल्लू, गरुड़, नीलकंठ, तोता, कबूतर, बगुला, गौरैया ये ऐसे पक्षी है। जिन्हें पवित्र माना जाता है।

हंस

जब कोई व्यक्ति सिद्ध हो जाता है तो उसे कहते है कि इसने हंस पद प्राप्त कर लिया। जब कोई समाधिस्थ हो जाता है। तो कहते है कि वह परमहंस हो गया। परमहंस सबसे बड़ा पद माना गया है। पक्षियों में हंस एक ऐसा पक्षी है।

जहां देव आत्माएं आश्रय लेती है। यह उन आत्माओं का ठिकाना है। जिन्होंने अपने जीवन में पुण्यकर्म किए है। जिन्होंने यम-नियम का पालन किया है। कुछ काल तक हंतस यानि में रहकर आत्मा अच्छे समय का इंतजार कर पुनः मनुष्य योनि में लौट आती है।

या फिर वह देवलोक चली जाती है। हंस पक्षी प्यार और पवित्रता का प्रतीक है। यह बहुत ही विवेकी पक्षी माना गया है। आध्यात्मिक दृष्टि मनुष्य के निःश्वास में हं और श्वास में स ध्वनि सुनाई पड़ती है। मनुष्य का जीवन क्रम ही हंस है। क्योंकि उसमें ज्ञान का अर्जन संभव है। अतः हंस ज्ञान, विवके, कला की देवी सरस्वती का वाहन है।

यह पक्षी अपना ज्यादातर समय मानसरोवर में रहकर ही बिताते है या फिर किसी एकांत झील और समुद्र के किनारे। यह पक्षी दाम्पत्य जीवन के लिए आदर्श है। यह जीवन भर एक ही पार्टनर की मौत हो जाए तो दूसरा अपना पूरा जीवन अकेले ही गुजार देती है।

मोर

मोर को पक्षियों का राजा माना जाता है। यह शिव पुत्र कार्तिकेय का वाहन है। भगवान कृष्ण के मुकुट में लगा मोर का पंख इस पक्षी के महत्व को दर्शाता है। यह भारत का राष्ट्रीय पक्षी है। इसकी दो प्रजातियां है।

नीला या भारतीय मोर जो भारत और श्रीलंका में पाया जाता है। अनेक धार्मिक कथाओं में मोर को बहुत ऊंचा दर्जा दिया गया है। हिन्दू धर्म में मोर को सार कर खाना महापाप समझा जाता है। मोर की उम्र 25 से 30 वर्ष तक होती है।

कौआ

कौए को अतिथि-आगमन का सूचक और पितरों का आश्रम स्थल माना जाता है। कौआ लगभग 20 इंच लंबा, गहरे काले रंग का पक्षी है। जिसके नर और मादा एक ही जैसे होते है। जिस दिन किसी कौए की मृत्यु हो जाती है। उस दिन उसका कोई साथी भोजन नहीं करता है।

कौआ अकेले में भी भोजन कभी नहीं खाता वह किसी साथी को साथ ही मिल बांटकर भोजन ग्रहण करता है। कौआ बगैर थके मीलों उड़ सकता है। कौए को भविष्य में घटने वाली घटनाओं का पहले से ही आभास हो जाता है।

श्राद्ध पक्ष में कौओं का बहुत महत्व माना गया है। इस पक्ष में कौओं को भोजन करना अर्थात अपने पितरों को भोजन कराना माना गया है।

उल्लू

उल्लू को लोग अच्छा नहीं मानते और उससे डरते है। लेकिन यह गलत धारणा है। उल्लू लक्ष्मी का वाहन है। उल्लू का अपमान करने से लक्ष्मी का अपमान माना जाता है। हिन्दू संस्कृति में माना जाता है कि उल्लू समृद्धि और धन लाता है।

डरावने लुक के कारण कुछ लोग उल्लू से डरते भी है और कुछ लोग उन लोगों को मूर्ख कहते है। जिनके उल्लू जैसे मुंह होते है। लेकिन यह धारणा गलत है। भारत वर्ष में प्रचलित लोक विश्वासों के अनुसार भी उल्लू का घर के ऊपर छत पर स्थित होना तथा शब्दोच्चारण निकट संबंधी की अथवा परिवार के सदस्य की मृत्यु का सूचक समझा जाता है।

सचमुच उल्लू को भूत-भविष्य और वर्तमान में घट रही घटनाओं का पहले से ही ज्ञान हो जाता है। उल्लू नीरव उड़ान भरने में पारंगत है। अर्थात् पंखों की फड़फड़ाहट या आवाज किए बगैर ही यह मीलों उड़ सकता है। उल्लू की आंखे रात में दूर तक देखने की क्षमता रखती है। यह प्राणी दिन में सोता और रात में जागता है।

उल्लू की श्रवण शक्ति भी तीव्र होती है। लिंगपुराण में नारद मुनि को मानसरोवर वासी उलूक से संगीत शिक्षा ग्रहण करने के लिए उपदेश दिया गया था। इस उलूक की हू हू हू हू सांगीतिक स्वरों में निकलती है। वाल्मीकी रामायण में उल्लू को मूर्ख के स्थान पर अत्यंत चतुर कहा गया है।

गरुड़

पक्षियों में गरूढ़ को सबसे श्रेष्ठ माना गया है। यह समझदार और बुद्धिमान होने के साथ-साथ तेज गति से उड़ने की क्षमता रखता है। गरूड़ के नाम पर एक पुराण भी है गरूड़ पुराण। यह भारत का धार्मिक और अमेरिका का राष्ट्रीय पक्षी है।

गरूड़ के बारे में पुराणों में अनेक कथाएं मिलती है। रामायण में तो गरूढ़ का सबसे महत्वपूर्ण पार्ट है। पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान विष्णु की सवारी और भगवान राम को मेघनाथ के नागपाश से मुक्ति दिलाने वाले

गरूड़ के बारे में कहा जाता है कि यह सौ वर्ष तक जीने की क्षमता रखता है। लेकिन आज कल गरूड़ के अस्तित्व पर संकट गहरा रहा है।

नीलकंठ

नीलकंठ को देखने मात्र से भाग्य का दरवाजा खुल जाता है। यह पवित्र पक्षी माना जाता है। दशहरा पर लोग इसका दर्शन करने के लिए बहुत ललायित रहते है। इसका आकार मैना के बराबर होता है। इसकी चोंच भारी होती है।

वक्षस्थल लाल, भूरा, उदर व पुच्छ को अधोतल नीला होता है। पंख पर गहरे और धूमिल नीले रंग के भाग उड़ान के समय चमकीली पट्टियों के रूप में दिखाई पड़ते है। त्रावणकोर के दक्षिण भाग को छोड़कर शेष भारत में यह पक्षी पाया जाता है।

तोता

इसे मिट्ठू भी कहते है। तोते का हरा रंग बुध ग्रह के साथ जोड़कर देखा जाता है। अतः घर में तोता पालने से बुध की कुदृष्टि का प्रभाव दूर होता है।

घर में तोते का चित्र लगाने से बच्चों का पढ़ाई में मन लगता है। वास्तुशास्त्र के अनुसार उत्तर दिशा में तोते की तस्वीर को लगाने से पढ़ाई में बच्चों की रूचि बढ़ती है साथ ही उनकी स्मरण क्षमता में भी इजाफा होता है।

इसके अलावा बहुत से तोता पंडित देखें होंगे जो भविष्यवाणी करते है। तोते के बारे में बहुत सारी कथाएं पुराणों में मिलती है।

इसके अलावा जातक कथाों, पंचतंत्र की कथाओं में भी तोते को किसी न किसी कथा में शामिल किया गया है। तोता अक्सर तमाशा दिखाने वाले और जादूगरों के पास देखा जाता है।

कबूतर

इसे कपोत कहते है। यह शांति का प्रतीक माना गया है। भगवान शिव ने जब अमरनाथ में पार्वती को अजर अमर होने के वचन सुनाए थे। तो कबूतरों के एक जोड़े ने यह वचन सुन लिए थे तभी से वे अजर-अमर हो गए।

आज भी अमरनाथ की गुफा के पास ये कबूतर के जोड़े आपको दिखाई दे जाएंगे। कहते है कि सावन की पूर्णिमा को ये कबूतर गुफा में दिखाई पड़ते है। इसलिए कबूतर को महत्व दिया जाता है। पहले के जमाने में कबूतर ही डाकिए का काम करता था।

पुराने समय में ही नहीं बल्कि 19वीं सदी शुरुआत में होने वाले पहले विश्वयुद्ध तक कबूतर के माध्यम से संदेश भेजा जाता था। अजीब है कि कबूतर मिलों तक जाकर यह संदेश देकर पुनः कैसे लौट आते होंगे।

बगुला

कहावत सुनी होगी बगुला भगत अर्थात् ढोंगी साधु। धार्मिक ग्रंथों में बगुले से जुड़ी अनेक कथाओं का उल्लेख मिलता है। पंचतंत्र में एक कहानी है बगुला भगत।

बगुला भगत पंचतंत्र की प्रसिद्ध कहानियों में से एक है जिसके रचयिता आचार्य विष्णु शर्मा है। बगुला के नाम पर एक देवी का नाम भी है। जिसे बगुलामुखी कहते है। बगुला ध्यान भी होती है अर्थात् बगुले को तरह एकटक ध्यान लगाना।

बगुले के संबंध में कहा जाता है कि ये जिस भी घर के पास के किसी वृक्ष आदि पर रहते है वहां शांति रहती है और किसी प्रकार की अकाल मृत्यु नहीं होती।

गौरैया

गौरैया एक छोटी चिड़िया है। यह हल्की भूरे रंग या सफेद रंग में होती है। इसके शरीर पर छोटे-छोटे पंख और पीली चोंच व पैरों का रंग पीला होता है। नर गौरैया का पहचान उसके गले के पास काले धब्बे से होता है। 14 से 16 सेमीमीटर लंबी यह चिड़िया मनुष्य के बनाए हुए घरों के आसपास रहना पसंद करती है।

भारतीय पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यह चिड़ियां जिस भी घर में या उसके आंगन में रहती है। वहां सुख और शांति बनी रहती है। खुशियां उनके द्वार पर हमेशा खड़ी रहती है और वह घर दिनोदिन तरक्की करना रहता है।

इसके अलावा भी हिन्दू धर्म में ऐसे और भी पक्षी है। जिनका धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना गया है। पक्षियों को हिन्दू धर्म में देवता और पितर माना गया है।

कहते है जिस दिन आकाश से पक्षी लुप्त हो जाएंगे। उस दिन धरती से मनुष्य भी लुप्त हो जाएगा। किसी भी पक्षी को मारना अपने पितरों को मारना माना गया है।

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