सफला एकादशी पर श्री हरि करते है समस्त कार्यों को सफल, जाने व्रत का महत्व

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पौष माह कृष्ण पक्ष की एकादशी को सफला एकादशी के नाम से जाना जाता है। वैसे से तो साल भर में 24 एकादशी की तिथि होती है। मान्यता है कि श्री हरि को एकादशी की तिथि सबसे अधिक प्रिय होती है।

माह के कृष्ण पक्ष व शुक्ल पक्ष दोनों में ही पड़ने वाली एकादशी की तिथि पर श्री हरि विष्णु की पूजा-अर्चना करते हुए भक्त व्रत करते है। व्रत के समस्त नियमों का पालन करते हुए श्री हरि से आशीर्वाद मांगते है।

प्रत्येक एकादशी का विशेष महत्व माना गया है। जिसमें सफला एकादशी में श्री हरि समस्त मुरादों को पूरी करते है। 9 जनवरी को सफला एकादशी का व्रत किया जाएगा।

व्रत की विधि

इस एकादशी के दिन स्नान के बाद सूर्यदेव को जल अर्पित करे।

इसके बाद व्रत-पूजन का संकल्प ले।

भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा करे।

भगवान को धूप, दीप, फल और पंचामृत आदि अर्पित करे।

नारियल, सुपारी, आंवला और लौंग आदि श्रीहरि विष्णु को अर्पित करे। अगले दिन द्वादशी पर व्रत खोले।

गरीबों को दान कराएं और उन्हें दान-दक्षिणा दे।

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सफला एकादशी की व्रत कथा

पद्म पुराण में वर्णित एक कथा के अनुसार महिष्मान नाम का एक राजा था। इनका ज्येष्ठ पुत्र लुम्पक पाप कर्मों में लिप्त रहता था। इससे नाराज होकर राजा ने अपने पुत्र को देश से बाहर निकाल दिया।

लुम्पक जंगल में रहने लगा। पौष कृष्ण पक्ष की दसमी की रात में ठंड के कारण वह सो न सका। सुबह होते-होते ठंड से लुम्पक बेहोश हो गया।

आधा दिन गुजर जाने के बाद जब बेहोशी दूर हुई तब जंगल में फल इक्ट्ठा करने लगा। शाम में सूर्यास्त के बाद यह अपनी किस्मत को कोसते हुए भगवान को याद करने लगा।

एकादशी की रात भी अपने दुखों पर विचार करते हुए लुम्पक सो न सका। इस तरह अनजाने में ही लुम्पक से सफला एकादशी का व्रत पूरा हो गया।

इस व्रत के प्रभाव से लुम्पक सुधर गया और उसके पिता ने अपना सारा राज्य लुम्पक को सौंप दिया और खुद तपस्या करने के लिए चले गए। काफी समय तक धर्म पूर्वक शासन करने के बाद लुम्पक भी तपस्या करने चला गया और मृत्यु के बाद विष्णु लोक में स्थान प्राप्त हुआ।

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