आध्यात्मिकता देती है मन रूपी घोड़े की दिशा बदलने की समझ . ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी

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बिलासपुर. कर्म करना जीवन का अनिवार्य अंग है। ज्ञानियों के लिए ज्ञानमार्ग और योगियों के लिए निष्काम कर्म मार्ग श्रेष्ठ है लेकिन दोनों के अनुसार कर्म तो करना ही पड़ता है।

कर्मयोगी सदा संगदोष से बचा रहता है और यथार्थ कर्म करता है अर्थात् जो कर्म आत्म उन्नति के लिए हो। प्रजापिता ब्रह्मा ने यज्ञ रचकर दैवीय संस्कारों की वृद्धि की और ऐसे

दैवीय संस्कार वालों के जीवन की हर आवश्यकता पूर्ण होती है, प्रकृति भी ऐसी आत्माओं की सेवा में हाजिर रहती है। कर्मयोगी के लिए वेद पढ़ने से अधिक महत्वपूर्ण किसी की वेदना पढ़कर उसकी मदद करना होता है।

कहा जाता है जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि। हम जिस रंग का चश्मा पहनेंगे, हमें वैसा ही दृश्य दिखाई देगा। इसलिए गीता का संदेश है कि दैहिक रूप से हिंसा न कर अपने मन को जीतो। मन जीते जगत जीत है।

उक्त बातें ब्रह्माकुमारीज़ टिकरापारा में मन के विज्ञान का उत्तम शास्त्र दृ गीता विषय पर हर रविवार को आयोजित वेब श्रृंखला़ के नौवें सप्ताह में साधकों को संबोधित करते हुए सेवाकेन्द्र प्रभारी ब्रम्हकुमारी मंजू दीदी जी ने कही।

उन्होंने आगे बताया कि ऐसे श्रेष्ठ पुरूष के आचरण का ही अनुसरण होता है जिन्हें हर कर्म के प्रति जागृति रहती है और यही भाव रहता है कि हम रंगमंच पर हैं हमारा अभिनय हर कोई देख रहा है।

भगवान ने ज्ञानी पुरूष की जिम्मेवारी बनाई है कि यदि उसके कर्म से कोई आत्मा भ्रमित हो जाती है या मार्ग भटक जाती है तो उसकी जिम्मेवारी भी ज्ञानी पुरूष की ही है। परमात्मा हम सभी अर्जुन रूपी आत्माओं से कहते हैं

कि रजोगुण से उत्पन्न काम, क्रोध, राग.द्वेष आदि के वशीभूत होकर मनुष्य पापकर्म करता है। ये विकार ज्ञानियों के विशेष वैरी हैं। कामए क्रोध से ज्ञान नष्ट हो जाता है। जिस प्रकार अग्नि को धुंआ ढंक देता है, शीशे को धूल ढ़ंक देता है

ऐसे ही आत्मा पर कामए क्रोध के विभिन्न अवस्थाओं का लेप चढ़ जाता है जिसकी तृप्ति कभी नहीं होती। इस पर जीत पाने के लिए निरंतर आध्यात्मिक पुरूषार्थ करना आवश्यक है।

आपने कहानी के माध्यम से बताया कि जिस प्रकार घोड़े को परछाई के भय से दूर करने के लिए उसकी दिशा बदलनी होती है उसी प्रकार आध्यात्मिकता हमें समझ देती है कि मन रूपी घोड़े की दिशा का परिवर्तन हम किस प्रकार करें।

गीता में यज्ञ की विवेचना करते हुए बताया कि यज्ञ किया जाता है शुद्धिकरण के लिए। इसमें विशेष कर तीन चीजों की आहूति दी जाती है जौ, तिल और घी। शुद्धिकरण के लिए

हमने स्थूल प्रक्रिया को अपनाया लेकिन सूक्ष्म भावार्थ को हमने समझा नहीं। तनए मन और धन का शुद्धिकरण करने के बजाय हमने प्रतीकात्मक रूप में जौ, तिल और घी को अग्नि में डाल दिया।

सूक्ष्म भावार्थ यही है कि योग रूपी अग्नि के द्वारा हमें तन, मन व धन की शुद्धि करनी चाहिए। संगदोष में आने से अशुद्धिकरण की प्रक्रिया शुरू हुई। उदाहरणस्वरूप धूम्रपान, व्यसन की लत लगी।

जब मन उसके वशीभूत हुआ तो तन भी व्यसनसामग्री की दुकान पर गया फिर धन खर्च किया तो धन भी अशुद्ध कार्य में चला गया।

दीदी ने जानकारी दी कि आज के सत्र में कर्मयोग . तृतीय अध्याय का समापन हुआ अगले रविवार के सत्र में चतुर्थ अध्याय अर्थात् ज्ञानकर्मसन्यासयोग का वर्णन किया जायेगा।

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