कुंभ के मेले से जुड़ी खास बातें, जाने विस्तार से पौराणिक कथा

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कुंभ का मेला केवल भारत में ही नहीं बल्कि दुनियाभर में प्रसिद्ध है। कुंभ का मेला कब से प्रारंभ हुआ है। इसका ठीक-ठाक निर्णय कर पाना कठिन है। क्योंकि वेदों में कुंभ पर्व का आधार केवल सूत्रों-मंत्रों में वर्णित किया गया है। जबकि पुराणों में इससे जुड़ी कुछ कथाओं के बारे में बताया गया है।

लेकिन कुंभ का आयोजन जिस वर्ष, जिस राशि पर सूर्य, चंद्रमा और बृहस्पति का संयोग होता है उसी वर्ष उसी राशि के योग में जहां-जहां अमृत बूंदे गिरी थी वहां-वहां कुंभ मेले का आयोजन किया जाता है। साल 2021 में वैशाख संक्रांति के समय सूर्य, चंद्रमा मेष राशि में तथा बृहस्पति कुंभ राशि में होंगे। इस वजह से कुंभ का आयोजन हरिद्वार में किया जाएगा। इस लेख के माध्यम से हम इससे जुड़ी पौराणिक कथाओं के विषय में बताएंगे।

दुर्वासा ऋषि के श्राप से जुड़ी है कुंभ मेले की पहली कथा

दुनिया के लिए कुुंभ मेला किसी वरदान से कम नहीं है लेकिन कुंभ की उत्पत्ति की कथा में एक ऋषि का शाप भी है और वह है महर्षि दुर्वासा। कथा के अनुसार महर्षि दुर्वासा ने एक दिव्य माला देवराज इंद्र को दी थी। देवताओं के राज होने की वजह से घमंड में चूर इंद्र ने उस माला को अपने ऐरावत हाथी के मस्तक पर रख दिया था।

ऐराव के मस्तक से माला गिर गई और उसने अपने पैरों से माला को रौंद डाला। महर्षि दुर्वासा ने इसे अपना अपमान समझा और क्रोध में आकर इंद्र को शाप दे दिया। इससे सारे संसार में हाहाकार मच गया। भगवान विष्णु की कृपा से सागर मंथन का आयोजन किया गया।

जिससे माता लक्ष्मी और अमृत निकला। देव-दानव के विवाद में अमृत की कुछ बूंदे धरती पर गिंरी। जिसकी वजह से कुंभ मेला लगने की परंपरा शुरु हुई। कुंभ मेले के पीछे महर्षि दुर्वासा का शाप भ्ज्ञी एक निर्णायक घटना थी।

कुंभ की दूसरी कथा

प्रजापति दक्ष की दो पुत्रियों कद्रू और विनता की शादी कश्यप ऋषि से ब्याही गई थी। एक बाद दोनों में विवाद हो गया कि सूर्य की अश्व काले है या सफेद। दोनों में शर्त लगी कि जिसकी बात झूठी निकलेगी। वहीं दासी बन जाएगी। यह तय किया गया कि दोनों बहनें अगले दिन यह पता करने जाएंगी।

कद्रू ने अपने पुत्रों को आदेश दिया कि वे जाकर अश्व की पूंछ पर लिपट जाएं जिससे उसकी पूंछ काली लगे। दोनों बहने फिर साथ गई और अश्व को देखकर विनता हार गई और परिणाम स्वरूप दासी बनना पड़ा। उसके कुछ दिन बाद विनता के पुत्र गरूड़ का जन्म हुआ।

विनता के साथ-साथ गरूड़ को भी पुत्र सर्पो की भी सेवा करनी पड़ती थी। जब गरूड़ ने अपनी और अपनी मां की इस दासता से मुक्ति के लिए पूछा तो सर्पों ने कहा िकवह नागलोग से अमृत कुंभ ला देगा तो इससे दासता मुक्त हो जाएगी।

गरूड़ नागलोक के लिए निकल गए। तो वासुकि ने इंद्र को सूचना दे दी। इंद्र ने गरूड़ पर चार बार आक्रमण किया और चारों प्रसिद्ध स्थानों पर कुंभ का अमृत छलका, जिससे कुंभ पर्व की शुरुआत हुई।

कुंभ मेला की तीसरी कथा

कुंभ की तीसरी कथा मिलती है सागर मंथन की। सागर मंथन देवताओं और असुरों के बीच किया गया पहला काम था। समुद्र मंथन में 14 चीजों की प्राप्ति हुई थी। जिसको देवताओं और असुरों के बीच बांट लिया गया था।

लेकिन अंत में निकले अमृत को लेकर दोनों के बीच संघर्ष हुआ। जिसकी वजह से अमृत की कुछ बूंदे पृथ्वी पर गिर गई। जहां-जहां अमृत छलका वहां-वहां कुंभ मेले का आयोजन शुरू हो गया।

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