धन-धन श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी के 400वें प्रकाश पूरब की खुशी में विशेष दीवान

Special Diwan in Dhan-Dhan Sri Guru Tegh Bahadur Sahib Ji's 400th Prakash Purab
धन-धन श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी के 400वें प्रकाश पूरब की खुशी में विशेष दीवान

करोना महामारी के चलते आज प्रकाश पूरब की खुशी में विशेष दीवान सुबह 10 सुबह 10 बजे से 11.15 बजे तक सजेगा। जिसका सीधा प्रसारण सोशल मीडिया के माध्यम से होगा और संगत अपने-अपने घर में बैठ कर आनंद प्राप्त करेगी और सभी के भले के लिए अरदास होगी। गुरुद्वारा दयालबंद श्री गुरु सिंघ सभा के हेडग्रंथी ने जानकारी दी।

उन्होंने बताया कि श्री गुरु तेग बहादुर जी महाराज सिक्ख धर्म के नोवें गुरु हुए थे । श्री तेग बहादुर जी प्रकाश आज के दिन सन-1621 में शुक्रवार के दिन सन-1621 में हुआ। इनका जन्म (सतगुरु पातशाह साहिब जी श्री हरिगोविंद पातशाह महाराजा जी के घर मे माता नानकी जी के कोख से हुआ था गुरु तेग बहादुर पातशाह महाराज जी का जन्म श्री अमृतसर साहिब में गुरु के महल में गुरुद्वारा साहिब बना हुआ है, उस स्थान में हुआ था ।)

गुरु तेग बहादुर पातशाह महाराज जी बचपन से ही शान्तचित और सहज स्वाभाव के थे । गुरु जी की बड़ी बहन थी जिनका नाम बीवी वीरो जी था। बीवी वीरो जी गुरु तेग बहादुर पातशाह महाराज जी से बहुत प्यार करती थी। गुरु जी अपने घर के सबसे छोटे बालक थे। पातशाह जी के घर मे चार और भाई थे ।

गुरु तेग बहादुर पातशाह महाराज जी को बचपन मे जब उनकी शिक्षा की उम्र हुई, तो उनकी पढ़ाई लिखाई के लिए तो पातशाह जी के पिता श्री हरिगोविंद पातशाह जी ने उनकी शिक्षा के लिए खास प्रबंध किया। उनकी गुरुमुखी विद्या आखिरी ज्ञान के लिए आपजा को भाई गुरु दास के पास भेजा गया। किरतकर सिक्खलाई के लिये उनको गुरु घर अनन सेवक भाई बाबा बुद्धा जी के पास भेजा गया और उनको शस्त्र विद्या के लिए गुरु घर में शखीर भाई जेठा जी के पास भेजा गया ।

गुरु तेग बहादुर पातशाह जी ने आखिरी ज्ञान की विद्या ली। गुरु तेग बहादुर जी बहुत अच्छे घुड़सवार थे, पातशाह घोड़ो के बहुत अच्छे पारवाख हुए । बहुत अच्छे नस्ल के घोड़ो की पहचान भी करते थे । अपने पास भी अच्छे घोड़े रखते थे। गुरु तेग बहादुर पातशाह जी बचपन से ही शान्त स्वभाव और शांत मन और सहज रहने वाले थे । कभी भी मायावी पदार्थों के पीछे नही भागते थे । खादय पदार्थो में भी रुचि नही रखते थे बहुत समय भक्ति करने में समाधि लगाए हुए रहते थे ।

खाना भी भूल जाते थे बहुत ही शांत और टिकाऊ स्वभाव में जीवन व्यतीत करते थे । गुरु जी बचपन से ही बहुत ही कृपालु और दयालु वृत्ति के थे। एक बार उनके बड़े भाई बाबा गुरु जी की जब शादी हुई थीं। जब घर से जब बारात में जाने के लिये तैयार हुए। बहुत अच्छे सुंदर वस्त्र पहने, तो जब बारात निकल रही थी तो बहुत गरीब बच्चा खड़ा था ठंड का समय था, और उसके तन पर कपड़ा नहीं था।

गुरु तेग बहादुर पातशाह जी ने उस बालक को अपने वस्त्र दे दिये और खुद वापस अपने घर आये, और अपनी माता नानकी जी से दूसरे वस्त्र देने के लिए बोले माता जी ने पूछा तुम्हारे वस्त्र थे वो कहा गए। तो उन्होंने बोला की कोई जरूरत मंद था । उसके पास वस्त्र नही थे, मैंने उसको दे दिए ।

मेरे पास और वस्त्र तो है, आप मुझे दे दीजिए। जब तेग बहादुर पातशाह महाराज जी बड़े हुए उनकी शादी की उम्र हुई तो श्री हरिगोविंद पातशाह महाराज, महाराजा जी ने उनकी शादी लालचन्द माता मिशनकौर की पुत्री बीवी गुजरी के साथ उनका रिश्ता पक्का किया और मार्च 1632 में उनकी शादी करतार पुर साहिब में हुई ।

शादी होने के बाद गुरु तेग बहादुर पातशाह के विवाह के बाद हरिगोविंद साहिब जी देखा पठान जी की चौथी जंग हुई। जिसमें गुरु तेग बहादुर पातशाह जी ने भी अपनी किसान से तेजी से जंग की और फ़ौज का बहुत बहादुरी से मुकाबला किया । जोर से किसान चलाई और इतिहास के अनुसार गुरु तेग जी का पहला नाम त्यांगल रखा गया ।

जब तेग बहादुर पातशाह महाराज जी ने बहुत बहादूरी व सुरमगति से तलवार चलाई तो हरिगोविंद पातशाह जी ये बोला की रईया आप त्यागमल नही तेग बहादुर हैं क्योंकि आपने जंग में बहुत सुरमगति से तलवार चलाई है।तेग बहादुर पातशाह जी, हरि गोविन्द साहिब जी के वचनों को हुकुम माना और अपनी पत्नी महालमाता गुजरी अपनी माता नानकी जी के साथ बाबा बकाला आ गए और उन्होंने वहां से आके लगभग 27 साल के समा बाबा बकाला में व्यतीत किये ।

वहां पर उन्होंने परमात्मा की भक्ती की और सिर्फ परमात्मा की किरत करने की सलाह दी 27 साल के बाद जब आठवें गुरु हरिकिशन पातशाह जी की ज्योति ज्योत समाई तो उन्होंने जाने से पहले वचन किया, कि बाबा बकाले में अगला गुरु जो है नौवां गुरु बाबा बकालें में है ।तेग बहादुर जी के बारे में उन्होंने वचन कहे । जब कुछ लोगों को पता चला कि गुरु हरि किशन साहिब जी ये वचन बोलकर गए है बाबा बकालें में है। उन्होंने किसी का नाम नही लिया ।

तो गुरु तेग बहादुर पातशाह जी महाराज अपने घर पर रहते थे और तेग बहादुर जी के अलावा वहां पर 22 लोग आए और अपने आप को गुरु कहने लगे और अपने तखत अपनी मंजिल लगाकर बैठ गए फिर लोग आएंगे, भेटा देंगे ऐसा पाखंड, करने लिए 22 लोग और बैठ गए लेकिन जितनी भी संगत आती भेटा तो लेते थे । लेकिन संगत को सन्तुष्टि और आत्मिक सुख गुरु से जो मिलना चाहिए वो नही मिला।

22 लोग आये जो गुरु से मिलना चहिए था वो नही मिला वो पाखंडी गुरु नही दे पाए । एक भाई मक्खन शाह लुबाना जी आये तो उन्होने अरदास की थी, उनका जहाज जो तूफान के कारण पानी मे फस गया है वो पानी से बाहर निकल जाए और अरदास सफल हुई और बाबा बकालें जाकर भाई मक्खन शाह लुबाना अरदास की हुई।

भेटा में से दो-दो मोहर 22 ढोंगि गुरु बने हुए लोगों के सामने रखी और लेकिन किसी ने भी ये नही बोला के आपने कम भेटा क्यों रखी जब आप मुसीबत में थे तब आपने 500 मोहर बोली थी लेकिन आप वो नही रखे हैं । तो इस कारण जो मखणशाह उनसे किसी से भी निष्ठा नही हुई थी तो वो ढूढ़ते दौड़ते हुए गुरु तेग बहादुर पातशाह महाराज जी के पास गए उनके चरणों मे भेटा रखी और मथा टेका तो पातशाह जी ने बोला कि जो गुरु के साथ वचन किया जाए उसे मुकरना नही चाहिए।

इससे सुनकर भाई लवाणा जी बहुत प्रसन्न हुए और उन्होने वहाँ से निकलकर गुरु तेग बहादुर पातशाह महाराज जी के घर के ऊपर छत थीं उस पर चढ़कर ऊँची -ऊँची पुकार कर बोला गुरु लादयो रे, गुरु लादयो जो भाग नावे पातशाह है वो प्रकट हो गए है । गुरु की गद्दी के बाद गुरु तेग बहादुर पातशाह महाराज जी अपने परिवार सहित लोगों की भलाई के लिए सच और परमात्मा से जुड़ने के लिए लोगों को सच और परमात्मा का उपदेश देने के लिए गुरु तेग बहादुर पातशाह महाराज यात्रा पर निकले ।

उन्होंने बंगाल, ढांका, असम तक की यात्रा की। इसी दौरान तेग बहादुर पातशाह महाराज जी के घर मे माता गुजरी के कोख से पटना साहिब में इकलौती संतान हुईं। श्री गुरुगोविंद सिहं सहित पातशाह महाराज जी का प्रकाश हुआ । गुरु तेग बहादुर जी ने किरतपुर साहिब के पास राजा से जमीन खरीदकर एक नया नगर बसाया उस नगर का नाम अपनी माता जी के नाम से नानकी रखा बाद में अनंदपुर रखा गया, जो आज श्री अनंदपुर साहिब के रूप में प्रचलित है।

गुरु तेग बहादुर पातशाह महाराज जी ने मालवे देश मे बंगाल देश मे और बंगाल, ढाका, असम तक सिक्खी का प्रचार किया लोगों को सच का उपदेश दिया। गुरु ग्रँथ साहिब पातशाह महाराज जी की रची हुई वाणी में से उनसठ शब्द और संतावन श्लोक दर्ज है। जो गुरु तेग बहादुर पातशाह महाराज जी की वाणी है, उसमें से हमको ये शिक्षा मिलती है ये उपदेश मिलता है कि गुरु तेग बहादुर पातशाह महाराज जी की वाणी है कि हम जीवन मे सच के साथ व्यतीत कर सकते है और सच को जीवन मे कैसे लाना है।

हमारे जीवन से विकार कैसे दूर हो सकते है, हमारे जो मन की भटकना है, हमारे मन की जो चिंता है वो कैसे खत्म हो सकती हैं, और हम अपने सासों के रहते हुए जीवित ही अकाल पुरख परमात्मा के चरणों मे कैसे समा सकते है। परमात्मा में कैसे लीन हो सकते है ये शिक्षा हमें तेग बहादुर पातशाह महाराज जी की वाणी से हमको प्राप्त होती है। सतगुरु पातशाह महाराज जी के जीवन काल से हमको अपने जीवन को सहज , सचा और सफल बनाने की शिक्षा मिलती है।

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