श्रीकृष्ण की लीला है अपरमपार, मनुष्य हो राक्षस सभी को दिखाया सही मार्ग-आचार्य अमर शुक्ला

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श्री मदभागवत कथा ज्ञान रासधारा के पंचम दिवस श्री गौरव कृष्ण जी के कृपा पात्र शिष्य आचार्य श्री अमर कृष्ण शुक्ला ने नंद उत्सव , कृष्ण बाल लीला , पूतना वध , कालिया नाग मर्दन व छप्पन भोग व गिरिराज जी का पूजन की कथा सुनाई

और अंत में भजन सब भक्तों ने गिरिराज जी की परिक्रमा लगाकर भजन पर झूम के आनंद लिया। 18 श्लोकों में नंदोत्सव का इतना सुंदर वर्णन किया कि 7 तिल के पहाड़ 2 लाख गोदान , स्वर्ण आभूषण इतना दान हुआ कि देखकर ऐसा लगता था कि कृष्ण के आने से मानो लक्ष्मी जी नंद गांव में स्वयं अपनी कृपा बरसा रही है ।

इतना दान हुआ लेकिन किसी ने भी उस दान को अपने पास नहीं रखा बल्कि आगे फिर दान कर दिया , जैसे कृष्ण के आगे सब तुच्छ प्रतीत हो रहा हो , उन्हें तो परम धन की प्राप्ति हो गई थी।

ईश्वर द्वारा की गई हर लीला हमें प्रेम , वात्सल्य, माता.पिता का आदर , गुरु का सम्मान, गौ सेवा, प्रकृति संरक्षण ,संस्कार, आध्यात्म, भक्ति , सामाजिक और नैतिक मूल्यों की शिक्षा प्रदान करती है। हमें उन्हें अपना आदर्श मानकर उनके दिखाए मार्ग पर चलना चाहिए ।

ईश्वर में आस्था है तो उलझनो में भी रास्ता है। कृष्ण ने आंख खोलते ही सर्वप्रथम गाय के ही दर्शन किए ।पूज्यश्री ने भी गौ संरक्षण पर जोर दिया। जिस गाय को भगवान तक पूजते हैं आज वही गाय कत्लखानों में जा रही है , रास्ते मे कचरा , प्लास्टिक थैली खा रही है ।

गाय का दूध , गोबर , मूत्र आदि सभी हमारे लिए उपयोगी है । भगवान की तो नज़र तक गाय की पूंछ से उतारी गई है इसका भी वर्णन भागवत जी मे आता है। अमर कृष्ण जी ने कहा दान की आज वास्तविक रूप में यदि आवश्यकता किसी को है तो वो गाय है ।

अगर हमें कुछ सेवा करना है तो गाय की करें , गौ शाला बनवाने में सहयोग करे, वहां चारा प्रदान करें। हमारे शास्त्रों में जो 16 संस्कार होते हैं उसके महत्व को बताया। विशेष महत्व होता है

नाम संस्कार का कृष्ण नाम मे जो क के नीचे मात्रा लगी है वह तो जैसे मछली पकड़ने वाला कांटा है , जो भी कृष्ण नाम लेता है वह मछली के समान कृष्ण से बंध जाता है ।कृष्ण अर्थात आकर्षण। कृष्ण से ज्यादा आकर्षण किसी में नहीं है।

जिसे एक बार कृष्ण की कथा से प्रेम हो जाए वह सारे संसार में भटकता है किंतु शांति तो उसे कथा रूपी अमृत पीकर ही प्राप्त होती है। पूतना वध में प्रभु की क्षमा शीलता को दर्शाया।

पूतना को अधोगति ना देकर उसे भी माता का स्थान प्रदान किया। जो भी पूतना चरित्र को सुनता है उसे प्रभु के चरणों की भक्ति की प्राप्ति होती है।ईश्वर से हमें जीवन एक संबंध अवश्य जोड़ना चाहिए ।

हमारे जीवन में जिस संबंध की कमी हो ईश्वर को हमें उसी स्थान पर रख लेना चाहिए। पिता की कमी होने पर पिता के स्थान पर , मां की कमी होने पर माता के स्थान पर, भाई की कमी हो तो भाई के स्थान पर , संतान न हो पुत्र के स्थान पर और यदि शत्रु ना हो तो ईश्वर को ही अपना शत्रु मान सकते हैं,

क्योंकि उनसे शत्रुता करने वाले भी उनकी कृपा पाकर उन्हीं के धाम को गए हैं, उनको भी प्रभु ने अपनाया है । समय आने पर हम अपने रिश्ते को भूल सकते हैं उनसे किंतु वह हमसे किया रिश्ता नहीं भूलते। हमें आवश्यकता पड़ने पर वो हमारे लिए जरूर उपस्थित होते है, उन्हें अपना मान के तो देखें।

भगवान मुक्ति तो प्रदान कर देते हैं परन्तु भक्ति आसानी से प्रदान नही करते

गोपियों के कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम व समर्पण भाव को दर्शाते हुए बताया कि कैसे गोपियां कृष्ण दर्शन के लिए रोज नए नए बहाने लेकर यशोदा माता के पास शिकायत लेकर जाती थी

और कृष्ण भी किस प्रकार गोपियों के जरा से माखन जरा सी छाछ के लालच में उनके लिए नृत्य करते थे जो तीनों लोकों के स्वामी है वह गोपीयो ओर ग्वालों के प्रेमभाव में उनके लिए उनके इशारों पर नाचते थे ।

महेस, गणेस, दिनेश, सुरेसहु जाहिं निरंतर गावे, जाहि अनादि, अनंत एअखंड अछेद, अभेद, सुवेद बतावे, नारद से सुक व्यास रटै, पचि हारे तऊ पुनि पार न पावे, ताहि अहीर की छोरियां छछिया भर छाछ पे नाच नचावे। गोवर्धन लीला के माध्यम से प्रकृति के महत्व को बताया, प्रकृति संरक्षण की शिक्षा प्रदान की।

पेड़.पौधों गाय की रक्षा और उनका हमारे जीवन में महत्व बताया।अगर आज हम उनके महत्व को नहीं समझे तो कल निश्चित हमें प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ेगा ।7 दिन गिरिराज जी को अपनी कनिष्ठा उंगली पर उठाकर कृष्ण ने हमें यह विश्वास दिलाया कि प्रभु अपने भक्तों की रक्षा के लिए 7 दिन 24 घंटे एक पैर पर तैयार खड़े हैं ,

हम उन्हें प्रेमभाव से पुकार के तो देखें। कथा को आज विश्राम देते हुए कल रुक्मणी विवाह के लिए सब को आमंत्रित किया । भगवान कृष्ण का गिरिराज पूजन कराने के पीछे रहस्य बस यही है कि इंद्र के अंदर अभिमान था और जहां अभिमान आ जाता है वहां भगवान नही हो सकते।

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