श्रावण पुत्रदा एकादशी 30 को, क्यों रखा जाता है ये व्रत और क्या है इसका महत्व, जाने यहां

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सवन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी की तिथि को श्रावण पुत्रदा एकादशी कहा जाता है। साल भर में कुल 24 एकादशी के व्रत होते है वहीं जब अधिमास हो तब इसकी संख्या 26 हो जाती है। सभी एकादशी का अपना अलग महत्व होता है। श्रावण मास की पुत्रदा एकादशी के व्रत का भी विशेष महत्व है। इस लेख के माध्यम से हम श्रावण पुत्रदा एकादशी व्रत के महत्व व कथा को बताएंगे।
पुत्रदा एकादशी का व्रत रखने से श्रेष्ठ संतान की प्राप्ति होती है। इसलिए इस व्रत को पुत्रदा एकादशी भी कहा जाता है। इस बार यह व्रत 30 जुलाई को मनाई जाएगी। पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक इस व्रत को विधिपूर्वक करने से मनुष्य के सभी पापों का नाश होता है और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसके अलावा अगर निःसंतान दम्पत्ति यह व्रत करते है तो उन्हें संतान सुख की प्राप्ति होती है।

व्रत की विधि

पंचांग के मुताबिक एकादशी की तिथि का आरंभ 30 जुलाई को होगा। सुबह स्नान करने के बाद सबसे पहले भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। इस दिन घी का दीपक जलाएं और पीले वस्त्र और भोग लगाएं क्योंकि भगवान विष्णु का पीले वस्त्र और पीले पुष्प प्रिय है इसदिन व्रत के दौरान अन्न का सेवन नहीं किया जाता है।

श्रावण पुत्रदा एकादशी व्रत का महत्व

एकादशी के व्रत को सभी व्रतों में श्रेष्ठ माना गया है। एकादशी व्रत के महात्म के बारे में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्टिर और अर्जुन को बताया था। पौराणिक कथाओं में इस व्रत को पापों से मुक्ति दिलाने वाला माना गया है। इस व्रत को रखने से घर में सुख समृद्धि आती है और भगवान विष्णु की कृपा सदैव अपने भक्तों पर बनी रहती है।

पुत्रदा एकादशी व्रत की कथा

पद्म पुराण में पुत्रदा एकादशी का वर्णन कुछ इस तरह से है कि द्वापर युग में महिश्मति पुरी के राजा एक शांत और धार्मिक व्यक्ति थे, लेकिन वे पुत्र से वंचित थे। राजा को चितिंत देख उनके शुभचिंतकों ने यह बात महामुनि लोमेश को बताई। जिन्होंने तब बताया कि राजा अपने पिछले जन्म में एक क्रूर और दरिद्र व्यापारी थे।


एकादशी के दिन दोपहर के समय वह बहुत प्यासा हो गए और प्यास बुझाने तालाब में पहुंचे जहां एक प्यासी गाय पानी पी रही थी। उसने उसे रोका और खुद पानी पी लिया। राजा का यह कृत्य धर्म के विपरीत था। लेकिन उसके कुछ अच्छे कर्म भी थे जिसके कारण वह इस जीवन में राजा बन गया। लेकिन उसे संतान का सुख नहीं मिला। तब महामुनि ने बताया कि यदि उसके सभी शुभचिंतक पूरी प्रक्रिया का सही तरीके से पालन करते हुए श्रावण पुत्रदा एकादशी का व्रत करते है और राजा को इसका लाभ प्रदान करते है तो वह निश्चत रूप में आशीर्वाद मिलेगा। इस प्रकार उनके निर्देशों के अनुसार राजा ने अपने लोगों के साथ यह व्रत किया और परिणामस्वरूप उनकी रानी ने एक पुत्र को जन्म दिया।

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