पितरों के लिए श्रद्धा प्रकट करना ही श्राद्ध, वेद-पुराणों में बताया गया है पुण्यकर्म

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पितर पक्ष सबसे पुण्य माह माना जाता है। पितरों का आगमन होता है।

अपने घर-परिवार में पहुंचकर वे उन्हें आशीर्वाद देते है।

वैदिक परंपरा व हिन्दू मान्यताओं के अनुसार पितरें के लिए श्रद्धा से श्राद्ध करना पुण्यकर्म है।

मान्यता मुताबिक पुत्र का पु़त्रत्व तभी सार्थक माना जाता है।

जब वह अपने जीवन काल में जीवित माता-पिता की सेवा करे।

उनके मरने के बाद उनकी मृत्यु तिथि पर महालय पितृपक्ष में पूरी विधि से श्राद्ध करे।

श्राद्ध का अर्थ

श्राद्ध का अर्थ है अपने पितरों के प्रति श्रद्धा प्रकट करना।

पुराणों के अनुसार मृत्यु के बाद भी जीव क पवित्र

आत्माएं किसी न किसी रूप में श्राद्ध पक्ष में अपने परिजनों को आशीर्वाद देने के लिए धरती पर आती है।

पितरों के परिजन उनका तर्पण कर उन्हें तृप्त करते है।

गया जाकर भगवान राम ने किया था श्राद्ध

गया जाकर पितरों का श्राद्ध करने से सात पीढ़ियों का उद्धार होता है। माना जाता है यहां भगवान विष्णु पितृ देवता के रूप में मौजूद है।

इसलिए इसे पितृ तीर्थ भी कहा जाता है। पिंडदान को मोक्ष प्राप्ति का एक सहज सरल मार्ग माना जाता है।

मान्यता है भगवान राम और सीताजी ने भी राजा दशरथ की आत्मा की शांति के लिए गया में ही पिंडदान किया था।

गया सुर के शरीर से बनी गया

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भस्मासुर के वंश में गयासुर नामक राक्षस ने कठिन तपस्या कर ब्रम्हाजी से वरदान मांगा था उसका शरीर देवताओं की तरह पवित्र हो जाए।

लोग उसके दर्शन मात्र से पाप मुक्त हो जाए। इस वरदान के मिलने के बाद स्वर्ग में अधर्मियों की जनसंख्या बढ़ने लगी।

इससे बचने के लिए देवताओं ने गयासुर से यज्ञ के लिए पवित्र स्थल की मांग की। गया सुर ने अपना शरीर देवताओं को यज्ञ के लिए दे दिया।

यज्ञ के बाद जब गयासुर लेटा तो उसका शरीर पांच कोस में फैल गया। यहीं जगह आगे चलकर गया बनी। गयासुर ने देवताओं से वरदान मांगा

कि यह स्थान लोगों को तारने वाला बना रहे। जो भी लोग यहां आकर किसी का तर्पण करने की इच्छा से पिंडदान करे। उन्हें मुक्ति मिले।

यहीं कारण है कि आज भी लोग अपने पितरों को तारने के लिए पिंडदान के लिए गया आते है।

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