गीता के श्लोक जो है जीवन के लिए सीख, पढ़े विस्तार से

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गीता के श्लोक के माध्यम से श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र में अर्जुन को ज्ञान दिया था लेकिन गीता सार आज के जीवन में भी महत्वपूर्ण है। उसके महत्व सीख को समझकर हम अपने जीवन में वर्तमान व भविष्य को सुधार सकते है।

जीवन का उद्देश्य पूरा करने के लिए एक बार गीता के सार का अवश्य ही समझे। गीता सार लेख के माध्यम से आज हम 7, 8 व 9 श्लोक के अर्थ को अभिषेक मिश्रा के मुताबिक बताएंगे।

7वां श्लोक

अस्माकं मु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम।

नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थ तान्ब्रबीमि ते।।

8वां श्लोक

भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिजयः।

अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च।।

9वां श्लोक

अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्जीविताः।

नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदा।।

श्लोक का अर्थ

हे ब्राम्हण श्रेष्ठ अपने पक्ष में भी जो प्रधान है उनको भी आप समझ लीजिए। आपकी जानकारी में मेरी सेना में जो-जो सेनापति है उनको बतलाता हूं। आप द्रोणाचार्य, पितामह भीष्म तथा कर्ण संग्राम विजयी कृपाचार्य तथा वैसे ही अश्वथामा, विकर्ण ओर सोमदत्त का पुत्र भूरीश्रवा। और मेरे लिए जीवन की आशा त्याग देने वाले बहुत से सूरवीर अनेक प्रकार के शस्त्रों से सुसज्जित और सब प्रकार के युद्ध में चतुर है।

इन श्लोको का महत्व

जीवन में किसी भी कार्य क्षेत्र में उतरने से पहले व्यक्ति अपनी कमियां और अपने गुणों का आकलन करता है। वह अपनी हार या अपने जीत का आकलन अपने और अपने विरोधियों के शक्ति का आकलन करने के बाद करता है।

यदि उसे अपनी शक्ति अपने विरोधियों के शक्ति से अधिक लगती है तभी वह कार्यक्षेत्र में उतरने का साहस करता है।

इस प्रकार गीता में इस श्लोक के माध्यम से यह बताया गया है कि सामान्य मनुष्य किसी कार्य को करने का निर्णय उस आधार पर करता है

कि उसके और उसके प्रतिस्पर्धीं की शक्तियां क्या है और इस सोच के कारण व्यक्ति का ध्यान अपने कार्य में नहीं रहता है। वह निरंतर अपने जीत और हार के कस्मकस में रहता है।

मिलता है यह सीख

जीत या हार से अधिक कार्य को उत्तम तरीके से पूर्ण करने का विचार अधिक लाभदायी होता है।

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