षटतिला एकादशी का व्रत खोलता है मोक्ष के द्वार, जाने कैसे

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हिन्दू धर्म में एकादशी का खास महत्व है। एकादशी का व्रत साल में 24 होता है। वहीं यदि मल या अधिक मास हो तो इसकी संख्या 26 हो जाती है। शास्त्रों में एकादशी के व्रत को मोक्ष प्रदान करने वाला, पापों से मुक्ति दिलाने वाला माना गया हैं।

प्रत्येक एकादशी का खास महत्व होता है। मकर संक्रांति के बाद पड़ने वाले एकादशी को षटतिला एकादशी के नाम से जाना जाता है। माना जाता है कि इस दिन व्रत व पूजन करने से श्रीहरि विष्णु मनुष्य के मोक्ष का मार्ग खोल देते है। इस साल 2021 में यह एकादशी 7 फरवरी को पड़ेगा। इस व्रत के महत्व को इस लेख के माध्यम से बताएंगे

षटतिला एकादशी का महत्व

षटतिला एकादशी के नाम के समान ही इस दिन तिल का खास महत्व होता है। अपनी दिनचर्या में इस दिन तिल के इस्तेमाल करने पर ध्यान दे। तिलों का दान करना करने से बहुत पुण्य मिलता है।

तिल का 6 कार्यों के लिए करे प्रयोग मिटेंगे पाप

षटतिला एकादशी के दिन तिल का 6 तरह से प्रयोग करने पर पापों का नाष हो जाता है। और बैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है। षटतिला एकादशी यानि तिलों के छह प्रयोग से युक्त एकादशी। इस एकादशी के दिन तिलों का उपयोग छह प्रकार से किया जाता है।

तिलों के इस उपयोग को परम फलदायी माना गया है। आस्था है कि षटतिला एकादशी के व्रत से उपासक को वाचिक, मानसिक और शारीरिक पापों से मुक्ति मिलती है। इस दिन तिल का उपयोग स्नान, उबटन, आहूति, तर्पण, दान और खाने में किया जाता है।

षटतिला एकादशी की पूजा विधि

एकादशी व्रत भगवान विष्णु को समर्पित होता है इस लिए इस दिन नहा धोकर सबसे पहले भगवान विष्णु की पूजा और ध्यान करे। अगले दिन द्वादशी पर सुबह सवेरे नहा धोकर भगवान विष्णु को भोग लगाएं और फिर ब्राम्हणों को भोजन कराएं।

अगर ब्राम्हणों को भोजन कराने में समर्थ ना हो तो एक ब्राम्हण के घर सूखा सीधा भी दिया जा सकता है। सीधा देने के बाद खुद अन्न ग्रहण करे।

इस दिन करे ये काम

इस दिन तिल के जल से नहाए।

पिसे हुए तिल का उबटन लगाएं।

तिलों का हवन करे।

तिल वाला पानी पीए।

तिलों का दान दे।

तिलों की मिठाई बनाएं

व्रत की कथा

भगवान विष्णु ने एक दिन नारद मुनि को षटतिला एकादशी व्रत की कथा सुनाई थी। जिसके मुताबिक प्राचीन काल में धरती पर एक विधवा ब्राम्हणी रहती थी। जो श्रीहरि की बड़ी भक्त थी और पूरी श्रद्धाभाव से पूजा करती थी। एक बार उस ब्राम्हणी ने एक महीने तक व्रत रखा और मेरी उपासना की।

व्रत के प्रभाव से उसका शरीर तो शुद्ध हो गया लेकिन वो ब्राम्हणी कभी अन्नदान नहीं करती थी। एक दिन भगवान विष्णु खुद उस ब्राम्हणी के पास भिक्षा मांगने पहंुचे। जब विष्णु देव ने भिक्षा मांगी तो उसने एक मिटृटी का पिंड उठाकर दे दिया।

तब भगवान विष्णु ने बताया कि जब ब्राम्हणी देह त्याग कर मेरे लोक आई तो उसे यहां एक खाली कुटिया और आम का पेड़ मिला। खाली कुटियां को देखकर ब्राम्हणी ने पूछा कि मैं तो धर्मपरायण हूं फिर मुझे खाली कुटिया क्यों मिली।

तब भगवान ने बताया कि यह अन्नदान नहीं करने तथा मुझे मिट्टी का पिंड देने के कारण हुआ है। तब भगवान विष्णु ने बताया कि जब देव कन्याएं आपसे मिलने आए तब आप अपना द्वार तभी खोलना जब वो आपको षटतिला एकादशी के व्रत का विधान बताए। तब ब्राम्हणी ने षटतिला एकादशी का व्रत किया और उससे उसकी कुटिया धन-धान्य से भर गई।

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