शरद पूर्णिमा 30 अक्टूबर को, जाने शरद पूर्णिमा का महत्व

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शरद पूर्णिमा आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को कहा जाता है। शास्त्रों के अनुसार शरद पूर्णिमा को बहुत महत्व दिया जाता हे। इस पूर्णिमा के बाद से ही हेमंत ऋतु का आरंभ हो जाता है।

धीरे-धीरे सर्दी का मौसम शुरू हो जाता है। इस दिन मां लक्ष्मी की विशेष पूजा की जाती है। इस लेख के माध्यम से शरद पूर्णिमा के विषय में विस्तार से बताएंगे। शरद पूर्णिमा को कोजागर पूर्णिमा और रास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है।

माना जाता है कि इस दिन मां लक्ष्मी विचरण करती है। इसलिए इस दिन माता लक्ष्मी की पूजा करने से उनका विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है और जीवन में कभी भी धन की कोई कमीं नहीं रहती।

शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रमा की किरणों से अमृत बरसता है। जिसके कारण इस दिन चंद्रमा की रोशनी भी बहुत अधिक होती है।

शरद पूर्णिमा का महत्व

आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है। इस दिन चंद्रमा अपनी समस्त कलाओं में पूर्ण होता है। ज्योतिषाचार्य एवं वास्तुविद डाॅ.उद्धव श्याम केसरी ने बताया कि इस दिन चंद्रमा की किरणों से अमृत बरसता है।

इस दिन की चांदनी सबसे ज्यादा तेज प्रकाश वाली होती है। इतना ही देवी-देवताओं को सबसे ज्यादा प्रिय पुष्प ब्रम्ह कमल भी शरद पूर्णिमा की रात को ही खिलता है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन किए गए धार्मिक अनुष्ठान कई गुणा फल देते है।

इसी कारण से इस दिन कई धार्मिक अनुष्ठान भी किए जाते है। शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रमा धरती के बहुत पास होता है। जिसकी वजह से चंद्रमा से जो रासायनिक तत्व धरती पर गिरते है।

वह काफी सकारात्मक होते है और जो भी इसे ग्रहण करता है उसके अंदर सकारात्मकता बढ़ जाती है। शरद पूर्णिमा को कामुदी महोत्सव के नाम से भी जाना जाता है।

इस दिन मां लक्ष्मी विचरण करती है। इसकी वजह से शरद पूर्णिमा को बंगाल में कोजागरी भी कहा जाता है। जिसका अर्थ है कौन जाग रहा है।

शरद पूर्णिमा की पूजा विधि

शरद पूर्णिमा के दिन सुबह ब्रम्ह मुहूर्त में उठकर किसी पवित्र नदी में स्नान अवष्य करे।

इसके बाद एक चैकी पर लाल कपड़ा बिछाकर उस पर माता लक्ष्मी की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करे और उन्हें लाल पुष्प, नैवैद्य, इत्र, सुगंधित चीजे अर्पित करे।

यह सभी चीजें अर्पित करने के बाद माता लक्ष्मी के मंत्र और लक्ष्मी चालीसा का पाठ अवश्य करे और उनकी धूप व दीप से आरती उतारे।

इसके बाद माता लक्ष्मी को खीर का भोग लगाए। किसी ब्राम्हण को खीर का दान भी अवश्य ही करे।

शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रमा की रोशनी में खीर अवश्य रखे और अगले दिन उसे पूरे परिवार के साथ मिल बांटकर खाएं।

शरद पूर्णिमा की कथा

पौराणिक कथा के अनुसार एक साहूकार की दो पुत्रियां थी। वह दोनों ही पूर्णिमा का व्रत किया करती थी। साहूकार की बड़ी पुत्री तो नियमों का पालन करके व्रत रखती थी। लेकिन साहूकार की छोटी पुत्री नियमों का पालन नहीं करती थी।

जब वह दोनों विवाह योग्य हो गई तो साहूकार ने दोनों का विवाह कर दिया। साहूकार की दोनों पुत्रियों के यहां संतान का जन्म हुआ। बड़ी पुत्री के यहां तो हष्ट-पुष्ट संतान ने जन्म लिया।

लेकिन उसकी छोटी पुत्री के याहां संतान जन्म लेते ही मृत्यु को प्राप्त हो जाती थी। कई बार संतान के मृत्यु को प्राप्त होने पर साहूकार की छोटी बेटी ने इसका कारण जानने के लिए एक ब्राम्हण को बुलाया।

जब साहूकार की छोटी बेटी ने इसका कारण ब्राम्हण से पूछा तो उसने बताया कि तुम पूर्णिमा के व्रत के नियमों का पालन नहीं करती हो। इसी कारण तुम्हारा व्रत सफल नहीं होता। ब्राम्हण की बात सुनकर साहूकार के बेटी ने पूर्णिमा का व्रत पूरे नियम और विधि विधान से करने का संकल्प लिया।

पूर्णिमा के आने से पहले ही उसने एक पुत्र को जन्म दिया। लेकिन वह मृत्यु को प्राप्त हो गया। साहूकार की उस कन्या ने अपने बच्चे के शव को एक पीढ़े में रखकर उस पर कपड़ा ढक दिया। ताकि किसी को बच्चे की मृत्यु के बारे में पता न चले।

इसके बाद उसने अपनी बड़ी बहन को बुलाकर वह पीढ़ा दे दिया। जैसे ही उसकी बड़ी बहन पीढ़े पर बैठने लगी तभी उसके लहंगे का एक भाग बच्चे को छूं गया। जिसके बाद वह बच्चा जिंदा हो गया और जोर-जोर से रोने लगा।

बच्चे को जोर-जोर से रोना सुनकर बड़ी बहन अत्यधिक डर गई और गुस्से में अपनी छोटी बहन से बोली की तू चाहती थी िकइस बच्चे की हत्या का दोष मुझ पर लग जाए। जिससे तू यह कह सके कि मेरे बैठने से ही तेरा बच्चा मरा है।

तब उसकी छोटी बहन ने कहा कि नहीं दीदी यह बच्चा तो पहले से मृत्यु का ग्रास बन चुका था। तुम्हारे पुण्य कर्मों के कारण ही इसे नया जीवन मिला है क्योंकि तुम पूर्णिमा का व्रत पूरे विधान से रखती हो और अब से मैं भी तुम्हारी तरह पूर्णिमा का व्रत पूरे विधि-विधान से करूंगी।

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