पुरुषोत्तम मास की दूसरी एकादशी परमा 13 अक्टूबर को, जाने इसका महत्व

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हिन्दू धर्म में एकादशी का व्रत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। प्रत्येक वर्ष 24 एकादशियां होती है। जब अधिकमास या मलमास आता है तब इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है। अधिक मास या मल मास को जोड़कर 26 एकादशी होती है।

अधिक मास में दो एकादशी होती है जो परमा और पद्यमिनी एकादशी के नाम से जानी जाती है। परमा एकादशी का जो महत्व है इस लेख के माध्यम से हम बताएंगे।

अधिकमास कृष्ण पक्ष में जो एकादशी आती है उसे हरिवल्लभा अथवा परमा एकादशी के नाम से जाना जाता है। ऐसा श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा है। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को इस व्रत की विधि बताई थी।

यह है परमा एकादशी की कथा

काम्पिल्य नगरी में सुमेधा नामक एक ब्राम्हण अपनी पत्नी के साथ निवास करता था। ब्राम्हण धर्मात्मा था और उसकी पत्नी पतिव्रता। यह परिवार स्वयं भूखा रह जाता परंतु अतिथियों की सेवा हृदय से करता।

धनाभाव के कारण एक दिन ब्राम्हण ने ब्राम्हणी से कहा कि धनोपार्जन के लिए मुझे परदेश जाना चाहिए। क्योंकि अर्थाभाव में परिवार चलाना अति कठिन है। ब्राम्हण की पत्नी ने कहा कि मनुष्य जो कुछ पाता है वह अपने भाग्य से पाता हे।

हमें पूर्व जन्म के फल के कारण यह गरीबी मिली है। अतः यही रहकर कर्म कीजिए जो प्रभु की इच्छा होगी वहीं होगा। ब्राम्हण को पत्नी की बात ठीक लगी और वह परदेश नहीं गया।

एक दिन संयोग से कौण्डिल्य ऋषि उधर से गुजर रहे थे तो उस ब्राम्हण के घर पधारे। ऋषि को देखकर ब्राम्हण और ब्राम्हणी अति प्रसन्न हुए। उन्होंने ऋषिवर की खूब आवभगत की।

ऋषि उनकी सेवा भावना को देखकर काफी खुश हुए और ब्राम्हण एवं ब्राम्हणी द्वारा यह पूछे जाने पर की उनकी गरीबी और दीनता कैसे दूर हो सकती है। उन्होंने कहा मल मास में जो कृष्ण पक्ष की एकादशी होती है उसे परमा एकादशी के नाम से जाना जाता है।

इस एकादशी व्रत को आप दोनो रखे। ऋषि ने कहा यह एकादशी धन वैभव देती है। पाप का नाश कर उत्तम गति भी प्रदान करने वाली हे। किसी समय में धनाधिपति कुबेर ने इस व्रत का पालन किया था।

जिससे प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने उन्हें धनाध्यक्ष का पद प्रदान किया। समय आने पर सुमेधा नामक उस ब्राम्हण ने विधि पूर्वक इस एकादशी का व्रत रखा जिससे उनकी गरीबी का अंत हुआ। पृथ्वी पर काफी समय तक सुख भोगकर वे पति-पत्नी श्री विष्णु के उत्तम लोक को प्रस्थान कर गए।

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