कर्मों का उदय प्रभु भक्ति, दया, दान, पुण्य, तप करके किया जा सकता है-जैन मुनि पंथक

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बिलासपुर– टिकरापारा गुजराती जैन भवन में चल रहे चातुर्मास ऑनलाइन व्याख्यान में परम पूज्य गुरुदेव पंथक ने कहा जो भी कर्म किए हैं उन कर्मों की सजा भुगतनी ही पड़ती है तो भगवान की भक्ति, तप, त्याग, व्रत करने की जरूरत क्यों आज गुरुदेव का केश लोचन हुआ ।
उन्होंने आगे बताया कि किए हुए कर्म चाहे पुण्य के या पाप के स्वरूप में हो जिसका कि कर्म राजा के प्रभाव से सजा भुगतना ही पड़ता है । वह भी बहुत तीव्रता से भुगतना पड़ता है । इसे समझने के लिए कर्म के दो भाग किया गया है एक तो अज्ञानता में किए गए कर्म और खुद की या परिवार की जिंदगी निभाने के वजह से सूक्ष्म जीवों की हिंसा होती है । इन सभी कर्मों की सजा भुगतना न हो तो प्रभु भक्ति, दया, दान, तप, साधना करने से ऐसी सजा खत्म हो जाती है ।


ऐसे कई कर्म की जो बड़े जीवो का घात करना, मांस भक्षण, मंदिरा पान, वैश्या गमन, चोरी, बलात्कार आदि कृतियों से और इरादा पूर्वक बड़े चाव के साथ किए गए। कर्म की सजा आवश्यक रूप से भुगतनी ही पड़ते हैं । जिन्हें निकाचित या तो चिकने कर्म कहा जाता है । लेकिन फिर भी यदि धर्म ध्यान, प्रभु भक्ति, दया, दान, पुण्य, तप करने से ऐसे कर्मों की सजा की तीव्रता हल्की हो जाती है और वह कर्म आसानी से भुगत सकते हैं ऐसी अनुकूल साधनए संयोग और शक्ति मिलती है ।


इसका सारांश यह है कि मनुष्य द्वारा किया गया । प्रभु भक्ति, साधना, तप, दान, धर्म कभी भी निरर्थक जाति नहीं है ।जब भी खराब कर्म उदय में आती है । तब हताश ना होने की जगह पर हो सके इतना धर्म ध्यान में रहने का और समभाव पूर्वक और धर्ममय जीवन जीने का प्रयत्न करने का होना ।
परम पूज्य गुरुदेव का केश लोचन बिलासपुर समाज के गोपाल वेलाणी, प्रकाश भाई, राजू तेजाणी, मनीष शाह के द्वारा किया गया । जिसमें कि गुरुदेव को अच्छी साता उपजी है । इस अवसर पर समाज के अध्यक्ष भगवानदास सुतारिया, कोषाध्यक्ष कीर्ति सुतारिया उपस्थित थे ।

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