गणेश चालीसा का करे पाठ, प्रथम पूज्य देगें सुख-समृद्धि

0

जय गणपति सद्गुण सदन कविवर बदन कृपाल।

विध्न हरण मंगल करण जय-जय गिरिजालाल।।

जय-जय-जय गणपति राजू।

मंगल भरण करण शुभ काजू।।

जय गजबदन सदन सुखदाता।

विश्व विनायक बुद्धि विधाता।।

वक्रतुंड शुचि शुण्ड सुहावन।

तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन।।

राजित मणि मुक्तन उर माला।

स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला।।

पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं।

मोदक भोग सुगंधित फूलं।।

सुंदर पीताम्बर तन साजित।

चरण पादुका मुनि मन राजित।।

धनि शिवसुवन षडानन भ्राता।

गौरी ललन विश्व विधाता।।

ऋद्धि-सिद्धि तव चंवर डुलावे।

मूषक वाहन सोहत द्वारे।।

कहौ जन्म शुभ कथा तुम्हारी।

अति शुचि पावन मंगल कारी।।

एक समय गिरिराज कुमारी।

पुत्र हेतु तप कीन्हा भरी।।

भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा।

तब पहुंच्यो तुम धरि द्विज रूपा।।

अतिथि जानि कै गौरी सुखारी।

बहु विधि सेवा करी तुम्हारी।।

अति प्रसन्न हवै तुम वर दीन्हा।

मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा।।

मिलहि पुत्र तुहि बुद्धि विशाला।

बिना गर्भ धारण यहि काला।।

गणनायक गुण ज्ञान निधाना।

पूजित प्रथम रूप भगवाना।।

अस कहि अंतर्धान रूप हवै।

पलना पर बालक स्वरूप हवै।।

बनि शिशु रूदन जबहि तुम ठाना।

लखि मुख सुख नहिं गौरि समाना।।

सकल मगन सुख मंगल गावहिं।

नभ ते सुरन सुमन वर्षावहिं।।

शंभु उमा बहुदान लुटावहिं।

सुर मुनि जन सुत देखन आवहिं।।

ल्खि अति आनंद मंगल साजा।

देखन भी आए शनि राजा।।

निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं।

बालक देखन चाहत नाहीं।।

गिरजा कछु मन भेद बढ़ायो।

उत्सव मोर न शनि तुहि भायो।।

कहन लगे शनि मन सकुचाई।

का करिहौ शिशु मोहि दिखाई।।

नहिं विश्वास उमा कर भयऊ।

शनि सों बालक देखन कहाऊ।।

पड़तहिं शनि दृग कोण प्रकाशा।

बालक शिर उड़ि गयो आकाशा।।

गिरजा गिरीं विकल हवै धरणी।

सो दुख दशा गयो नहिं वरणी।।

हाहाकार मच्यो कैलाशा।

शनि कीन्हों लखि सुत को नाशा।।

तुरत गरूड़ चढ़ि विष्णु सिधाए।

काटि चक्र सो गज शिर लाए।।

बालक के धड़ ऊपर धारयो।

प्राण मंत्र पढ़ शंकर डारयो।।

नाम गणेश शंभु तब कीन्हे।

प्रथम पूज्य बुद्धि निधि वर दीन्हे।।

बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा।

पृथ्वी की प्रदक्षिणा लीन्हा।।

चले षडानन भरमि भुलाई।

रची बैठ तुम बुद्धि उपाई।।

चरण मातु-पितु के धर लीन्हे।

तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हे।।

धनि गणेष कहि शिव हिय हरषे।

नभ ते सुरन सुमन बहु बरसे।।

तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई।

शेष सहस मुख सकै न गाई।।

मैं मति हीन मलीन दुखारी।

करहुं कौन बिधि विनय तुम्हारी।।

भजत रामसुंदर प्रभुदासा।

लख प्रयाग ककरा दुर्वासा।।

अब प्रभु दया दीन पर कीजै।

अपनी शक्ति भक्ति कुछ दीजै।।

दोहा

श्री गणेश यह चालीसा पाठ करें धर ध्यान।

नित नव मंगल गृह बसै लहे जगत सन्मान।।

सम्वत अपन सहस्त्र दश ऋषि पंचमी दिनेश।

पूरण चालीसा भयो मंगल मूर्ति गणेश।।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here