राम कथा का फेसबुक लाइव के माध्यम से किया जा रहा वाचन, भक्त हो रहे भाव-विभोर

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बिलासपुर में आचार्य अमर कृष्ण शुक्ला जी द्वारा संगीतमय श्री रामकथा का फेसबुक पर लाइव प्रसारण कोरोना की विकट परिस्थितियों को देखते हुए 26 सितंबर से 4 अक्टूबर तक प्रतिदिन दोपहर 3 बजे से 6 बजे तक किया जा रहा है ताकि प्रतिदिन सभी भक्त घर पर सुरक्षित रहते हुए कथा श्रवण कर लाभान्वित हो सकें।

संजीव रीना श्रीवास्तव ने व्यास पूजन किया। इस बीमारी में जो लोग संक्रमित हैं उनको व उनके परिजनों को अपने मन को मजबूत रखते हुए इस बीमारी से लड़ने के लिए सकारात्मक विचार रखना अतिआवश्यक है जिसमें भगवान का नाम, उनकी कथा, सत्संग, संकीर्तन सर्वोत्तम उपाय है।

ईश्वर पर विश्वास ही नकरात्मकता को समाप्त कर देता है। द्वितीय दिवस की कथा प्रसंग में तुलसीदास जी द्वारा किया मंगलाचरण का वर्णन, सती चरित्र का बहुत सुंदर चित्रण किया। रामचरितमानस में 7 कांड हैं और उन्हीं के अंतर्गत इस ग्रंथ में 27 श्लोक, 4608 चौपाई, 1074 दोहे, 207 सोरठा और 86 छन्द हैं।

चौपाइयां केवल शब्दक ही नहीं हैं बल्कि मानव कल्याीण का साधन भी है। श्री राम की वंदना की चौपाई सुनाते हुए कहा बंदउँ नाम राम रघुबर को। श्री राम के नाम की महिमा का गुणगान करते हुए राम से पहले राम के नाम की वंदना की ।

राम से बड़ा राम का नाम। राम का तो नाम लेने मात्र से सब कार्य सिद्ध हो जाते हैं। राम नाम की महिमा में राम सेतु निर्माण का प्रसंग सुनाया, कि जब सीता जी को लेने लंका जाने के लिए समुद्र पार करने हेतु सेतु का निर्माण करना था तो वानर सेना द्वारा पत्थर पर राम नाम लिख कर समुद्र में डाले जा रहे थे।

जिन पर राम का नाम था वो तो तैर रहे थे और वहीं जो पत्थर श्री राम स्वयं डाल रहे थे वो डूब जाते थे। इसके पीछे छुपे गूढ़ रहस्य को भी अमर शुक्ला जी ने भक्तो को बताया कि क्यों राम जी द्वारा डाले गए पत्थर डूब रहे थेए क्योंकि जिनको भगवान राम स्वयं पानी मे डाल देंए अपने से दूर कर दें छोड़ दें, वो तो डूब ही जायेगा।

लेकिन जो राम का नाम लेगा जिस के हृदय में राम है वो तो इस भवसागर से पार हो जाएगा। रामष् नाम वह महामंत्र है जिसे श्रीशंकर जी निरन्तर जपते रहते हैं, जो कि जन्म.मृत्यु के चक्र से मुक्त होने के लिये सबसे आसान ज्ञान है।

राम नाम की महिमा को श्रीगणेश जी जानते हैं, जो कि इस नाम के प्रभाव के कारण ही सर्वप्रथम पूजित होते हैं। सृष्टि के प्रथम कवि श्रीवाल्मीकि जी ने राम नाम के प्रताप को जाना, जो कि उल्टा नाम मरा जपकर डाकू से महर्षि वाल्मीकि बन कर प्रसिद्ध हो गये। भगवान के अन्य नाम की अपेक्षा राम नाम हजार नाम के समान है।

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