रक्षाबंधन का त्योहार प्रेम वह सादगी के साथ मनाया गया

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रक्षाबंधन भाई-बहन का प्यार का बंधन रेशम की डोरी का बंधन यह पवित्र त्योहार आज से नहीं सदियों से चला आ रहा है। हिंदू धर्म में इस त्योहार को बड़े ही प्रेम और भक्ति के साथ मनाया जाता है। कहा जाता है कि रक्षाबंधन महाभारत काल से हुई द्रौपति ने एक दिन भगवान कृष्ण को रेशम साड़ी का टुकड़ा फाड़ के कलाई में बांधा था।

श्री कृष्ण ने अपनी बहन माना था, और रक्षा का वादा किया था उसने निभाया भी जब दुशासन द्रोपदी का चीर हरण कर रहा था द्रोपदी की लाज बचाने के लिए कोई नहीं आया तब उसने श्रीकृष्ण को याद किया। श्री कृष्णा ने अपना वादा निभाते हुए बहन की लाज बचाने के लिए अदृश्य रूप से पहुंच गए। कलयुग में भी गुरु नानक देव जी को उसकी बहन नानकी जी ने राखी बांधी थी वैसे यह त्योहार तो हिंदुओं का है पर इसे सभी धर्म के लोग मनाते हैं इस त्यौहार को सर्वधर्म का प्रतीक भी माना जाता है करो ना महामारी के कारण कई बहनें इस बार अपने भाइयों को राखी नहीं बांध पाई और न ही भेज पाई फिर भी जो बहने यहां पर थी उन्होंने अपने भाइयों को रेशम की डोरी से बनी राखी बांधी रेशम की डोरी की ताकत है

जो एक भाई को सात समुंदर पार करके अभी खींच लाती है बहन के पास जूना बिलासपुर निवासी मां कलावती दुसेजा 82 साल होने के बाद भी अपने भाई सतराम सीदारा को राखी बांधी। चल नहीं सकती है मां बैठी रहती है फिर भी बहन का प्यार है जो कम नहीं हुआ। विजय दुसेजा ने भी सर्व धर्म का पालन करते हुए ओम नगर जरहाभाठा निवासी खैरून खान व भारतीय सिंधु सभा छत्तीसगढ़ प्रदेश महिला विंग की अध्यक्ष विनीता भावनानी से राखी बंधवाई। पिछले 20 सालों से यह सिलसिला चला रहा है वैसे भी बिलासपुर शहर सर्व धर्म का प्रतीक है सद्भावना का प्रतीक है प्रेम का प्रतीक है आपसी भाईचारे का प्रतीक है।

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