रक्षा बंधन 3 अगस्त को मनाया जाएगा, जानिय महत्व के विषय में

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आज के दौर में जब रिश्ते धुंधलाते जा रहे है। ऐसे में भाई-बहन के पवित्र रिश्ते को मजबूत प्रेम आधार देता है रक्षा बंधन का त्योहार। इस पर्व का ऐतिहासिक, सामाजिक, धार्मिक महत्व है। इसे श्रावण पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। इस वर्ष यह पर्व 3 अगस्त को मनाया जाएगा। इस लेख के माध्यम से हम इसके महत्व पर प्रकाश डालेंगे।
रक्षा बंधन का पर्व भाई-बहन के भावनात्मक संबंधों का प्रतीक पर्व है। इस दिन बहन भाई की कलाई पर रेशम का धागा बांधती है तथा उसके दीर्घायु जीवन एवं सुरक्षा की कामना करती है। बहन के इस स्नहे बंधन से बंधकर भाई उसकी रक्षा के लिए कृत संकल्प होता है। राखी बांधना सिर्फ भाई-बहन के बीच का कार्यकलाप नहीं रह गया। अब राखी देश की रक्षा, पर्यावरण की रक्षा, धर्म की रक्षा, हितों की रक्षा आदि के लिए भी बांधी जाने लगी है।

पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व

ऐसाी मान्यता है कि श्रावणी पूर्णिमा को राखी बांधने से बुरे ग्रह कटते है। श्रावण की अधिष्ठात्री देवी द्वारा ग्रह दृष्टि-निवारण के लिए महर्षि दुर्वासा ने रक्षा बंधन का विधान किया। इतिहास में रखी के महत्व के अनेक उल्लेख मिलते है। महाभारत में द्रौपदी ने श्री कृष्ण को तो इतिहास में कर्मावती ने हुमायू को राखी बांधी थी जैसे कई कहानियां है और इस राखी की लाज भी लोगों ने अपने बहन की रक्षा करते हुए बचाई थी।

विजय का बताया गया है प्रतीक

पुराणों में उल्लेख है कि देवासुर संग्राम के युग में देवताओं की विजय से रक्षाबंधन का त्योहार शुरू हुआ। इस संबंध में एक और किवदंती प्रसिद्ध है कि देवताओं और असुरों के युद्ध में देवताओं की विजय को लेकर कुछ संदेह होने लगा। तब देवराज इंद्र ने इस युद्ध में प्रमुखता से हिस्सा लिया। देवराज इंद्र की पत्नी इंद्राणी ने श्रावण पूर्णिमा के दिन गुरु बृहस्पति के पास गई थी। तब उन्होंने विजय के लिए रक्षाबंधन बांधने का सुझाव दिया। तब इंद्राणी पति को विजय श्री मिले इस लिए राखी बांधी थी। लेकिन इसे भाई-बहन नहीं बल्कि विजय के प्रतीक के तौर पर बांधा गया था। अनेक पुराणों में श्रावणी पूर्णिमा को पुरोहितों द्वारा किया जाने वाला आशीर्वाद कर्म भी माना जाता है। ये ब्राम्हणों द्वारा यजमान के दाहिने हाथ में बांधा जाता है।

है कई पौराणिक कथा

रक्षा बंधन के पवित्र पर्व को लेकर कई पौराणिक कथाएं है। उनमें से एक कथा का उल्लेख कर रहे है। एक बार भगवान श्रीकृष्ण के हाथ में चोट लग गई तथा खून की धार बह निकली। यह सब द्रौपदी से नहीं देखा गया और उसने तत्काल अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर श्रीकृष्ण के हाथ में बांध दिया। फलस्वरूप खून बहना बंद हो गया। कुछ समय बाद जब दुःशासन ने द्रौपदी का चीरहरण किया तब श्रीकृष्ण ने चीर बढ़ाकर इस बंधन का उपकार चुकाया।

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  1. इतनी अच्छी जानकारी देने के लिए काजल बहोत बहोत धन्यवाद

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