संतान सप्तमी 24 को, जाने व्रत की कथा और विधि के विषय में

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संतान सप्तमी का व्रत महिलाएं अपने संतान के दीर्घायु के लिए करती है। 24 अगस्त को इस बार संतान सप्तमी का व्रत किया जाएगा। इस लेख के माध्यम से हम व्रत की पूजन विधि और कथा के विषय में बताएंगे।

यह व्रत भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की सप्तमी के दिन किया जाता है। स्त्री-पुरुष दोनों ही समान रूप से इसे कर सकते है। भविष्योत्तर पुराण में श्रीकृष्ण युधिष्ठिर संवाद के रूप में यह मुक्ताभारण संतान सप्तमी की कथा आती है। इस व्रत के अनुष्ठान से निःसंतान दम्पत्ति संतान पाते है। जिनकी संतान अल्पायु होती है।

जीवित नहीं रहती उनको यह व्रत संकल्प के साथ करना चाहिए। क्योंकि संसार में गृहस्थ पुरुष को समस्त सुखों के रहते हुए यदि संतान सुख होना न होना पूर्व जन्मों के कर्मो। का फल है। तपस्या और दान से उत्पन्न होने वाले पुण्यों का प्रताप ही संतान की प्राप्ति कराता है।

अनेक परम तपस्वी महाऋषियों ने अपने अनुष्ठानों के द्वारा ऐसे सफल उपाय किए है। ये सब उपाय हमें अपने शास्त्रीय ग्रंथों में मिलते है। संतान सप्तमी का यह व्रत भी धार्मिक आस्तिक श्रद्धालुओं के लिए एक सरल उपाय है।

व्रत की विधि

इस व्रत की साधना को साधारणतः गृहस्थीजन श्रद्धा से अपने आप परिवारजनों के साथ कर सकते है। किंतु समर्थ और इच्छुक व्यक्ति वैष्णव आचार्य के द्वारा भी विधिपूर्वक अनुष्ठान करा सकते हे। वस्तुतः आवश्यकता तो पूर्ण श्रद्धा और भावना ही है।

यह भगवान शंकर पार्वती को समर्पित है। इसीलिए यह पुनीत व्रत भादों के महीने की शुक्ल पक्ष की सप्तमी के दिन किया जाता है। उस दिन ब्रम्ह मुहूर्त में उठकर किसी नदी अथवा कुंए के पवित्र जल से स्नान करके निर्मल वस्त्र पहनना चाहिए।

फिर श्रीशंकर भगवान तथा जगदंबा पार्वतीजी की मूर्ति की स्थापना करे। इन प्रतिमाओं के सम्मुख सोने-चांदी में सात गांठे लगानी चाहिए। धूप, दीप अष्टगंध से पूजा करके अपने हाथ में बांधे।

भगवान शंकर से अपनी कामना सफल होने की शुद्ध भाव से प्रार्थना करें तदनंतर सा पुआ बनाकर भगवान को भोग लगाए।

साथ ही पुआ एवं यथा शक्ति सोने और चांदी की एक अंगूठी बनाकर इन सबाको एक तांबे के पात्र में रखकर और उनका शोड़शोपचार विधि से पूजन करके किसी सदाचार धर्मनिष्ठ, कर्मनिष्ठ सत्पात्र ब्राम्हण को दन में दे देवे।

इस प्रकार से व्रत का परायण करना चाहिए। भाद्रपद की शुक्ल पक्ष की तिथि को महादेव व पार्वती की पूजा कर कथा का श्रवण करना चाहिए।

व्रत की कथा

एक दिन युधिष्ठिर ने भगवान से कहा कि हे प्रभो कोई ऐसा उत्तम व्रत बताइए। जिसके प्रभाव से मनुष्यों के सांसारिक दुःख क्लेश दूर होकर पुत्र एवं पौत्रवान हो। यह सुनकर भगवान बोले हे राजन। तुमने बड़ा ही उत्तम प्रश्न किया है। मै।

तुमको एक पौराणिक इतिहास सुनाता हूं। ध्यानपूर्वक सुनो। एक समय श्री लोमश ऋषि ब्रजराज की मथुरा पुरी में वसुदेव-देवकी के घर गए। ऋषिराज को आया हुआ देखकर के दोनों अत्यंत प्रसन्न हुए।

उनको उत्तम आसन पर बैठाकर उनकी अनेक प्रकार से वंदना तथा सत्कार किया। फिर मुनि के चरणोदक से अपने घर तथा शरीर को पवित्र किया। मुनि प्रसन्न होकर उनको कथा सुनाने लगे। कथा कहते-कहते लोमश ऋषि ने कहा कि

हे देवकी दृष्ट दुराचारी कंस ने तुम्हारे कई पुत्र मार डाले है। जिसके कारण तुम्हारा मन अत्यंत दुखा है। इसी प्रकार राजा नहुष की पत्नी चंद्रमुखी भी दुखी रहा करती थी।

किंतु उसने संतान सप्तमी का व्रत विधि-विधान सहित किया। जिसके प्रताप से उसको संतान का सुख प्राप्त हुआ। यह सुनकर देवकी ने हाथ जोड़कर मुनि से कहा कि हे ऋषिराज कृपा करके रानी चंद्रमुखी का संपूर्ण वृतंात तथा इस व्रत का विधान विस्तार से मुझे बताइए।

जिससे मैं भी इस दुख से छुटकारा पाऊ। लोमश ऋषि ने कहा हे देवकी अयोध्या के राजा नहुष थे। उनकी पत्नी चंद्रमुखी अत्यंत सुंदर थी।

उसी नगर में विष्णुगुप्त नाम का एक ब्राम्हण रहता था। उसकी स्त्री का नाम भद्रमुखी था। वह भी अत्यंत रूपवान थी। रानी और ब्राम्हणी में अत्यंत प्रेम था। एक दिन दोनों सरयू नदी में स्नान करने के निमित्त गई।

वहां उन्होंने देखा कि अन्य बहुत सी स्त्रियां सरयू नदी में स्नान करके निर्मल वस्त्र पहनकर एक मंडप में भगवान शंकर व माता पार्वती की मूर्ति स्थापित करके उनकी पूजा कर रही थी।

रानी और ब्राम्हणी ने उनको देखकर स्त्रियों से पूछा कि बहन यह तुम किस देवता का और किस कारण से यह पूजन व्रत कर रही हो। यह सुन उन स्त्रियों ने कहा कि हम

संतान सप्तमी का व्रत कर रही है। हमने शिव पार्वती का पूजन चंदन अक्षत आदि से षोडषोपचार विधि से किया है। यह सब इसी पुनीत व्रत का विधान है।

यह सुनकर रानी और ब्राम्हणी ने भी इस व्रत के करने का म नही मन संकल्प किया। घर वापिस लौट आई। ब्राम्हणी भद्रमुखी तो इस व्रत को नियम पूर्वक करती रही। किंतु रानी राजमद के कारण इस व्रत को कभी करती, कभी भूल जाती।

कुछ समय बाद यह दोनों मर गई। दूसरे जन्म में रानी ने बंदरिया और ब्राम्हणी ने मुर्गी की योनि पाई। इधर ब्राम्हणी मुर्गी की योनि में भी कुछ नहीं भूली। भगवान शंकर व पार्वती का ध्यान करती रही।

उधर रानी बंदरिया की योनि में सब कुछ भूल गई। थोड़े समय के बाद इन दोनों ने यह देह त्याग दिया। अब इनका तीसरा जन्म मनुष्य योनि में हुआ। उस ब्राम्हणी ने तो एक ब्राम्हण के यहां कन्या के रूप में जन्म लिया।

रानी ने एक राजा के यहां राज कन्या के रूप में जन्म लिया। उस ब्राम्हण कन्या का नाम भूषण देवी रखा गया। विवाह योग्य होने पर उसका विवाह गोकुल निवासी अग्निझील नामक ब्राम्हण से कर दिया।

भूषण देवी इतनी सुंदर लगती थी कि वह आभूषण रहित होते हुए भी अत्यंत सुंदर लगती थी। कि कामदेव की पत्नी रति भी उसके सम्मुख लजाती थी। भूषण देवी के अत्यंत सुंदर सर्वगुण सम्पन्न चंद्रमा के समान, धर्मवीर, कर्मनिष्ठ, सुशील स्वभाव वाले

आठ पुत्र उत्पन्न हुए। यह शिव के व्रत का पुनीत फल था। दूसरी ओर शिव विमुख रानी के गर्भ से कोई भी पुत्र नहीं हुआ और निःसंतान दुखी रहने लगी।

रानी और ब्राम्हणी में जो प्रीति पहले जन्म में थी वह अब भी बनी रही। रानी जब वृद्धावस्था को प्राप्त होने लगी। तब उसके एक गूंगा व बहरा तथा बुद्धिहीन, अल्पायुवाला एक पुत्र हुआ और वह नौ वर्ष की आयु में इस क्षण भंगुर संसार को छोड़कर चला गया।

अब तो रानी पुत्र शोक में अत्यंत दुखी हो व्याकुल रहने लगी। दैवयोग से भूषण देवी ब्राम्हणी रानी के याहां अपने सब पुत्रों को लेकर पहुंची। रानी का हाल सुनकर उसे भी बहुत दुख हुआ।

किंतु इसमें किसी का क्या वश। कर्म और प्रारब्ध के लिखे को स्वयं ब्रम्हा भी नहीं मेट सकते है। रानी कर्मच्युत भी थी। इसी कारण उसे यह दुख देखना पड़ा। इधर रानी उस ब्राम्हणी के इस वैभव और आठ पुत्रों को देखकर उससे म नही मन ईष्र्या करने लगी

तथा उसके मन में पाप उत्पन्न हुआ। उस ब्राम्हणी ने रानी का संताप दूर करने के निमित्त अपने आठों पुत्र रानी के पास छोड़ दिए।

रानी ने पाप के वशीभूत होकर उन ब्राम्हण पुत्रों की हत्या करने के विचार से लड्डू में विष मिलाकर उनको भोजन करा दिया। परंतु भगवान शंकर की कृपा से एक भी बालक की मृत्यु नहीं हुई। यह देखकर तो रानी अत्यंत ही आश्चर्यचकित हुई।

इस रहस्य का पता लगाने मन में ठान ली। भगवान की पूजा सेवा से निवृत्त होकर जब भूषण देवी आई तो रानी ने उससे कहा कि मैंने तेरे पुत्रों को मारने के लिए इनको जहर मिलाकर लड्डू खिल दिए।

किंतु इसमें से एक भी नहीं मरा। तूने ऐसा कौन सा दान, पुण्य, व्रत किया है। जिसके कारण तेरे पुत्र भी नहीं मरे और तू नित्य नए सुख भोग रही है। तू बड़ी सौभाग्यवती है। इन सबका भेद तू मुझे निष्कपट होकर समझा।

मैं तेरी बड़ी ऋणी रहूंगी। रानी के ऐसे दीन वचन सुनकर भूषण ब्राम्हणी कहने लगी। हे रानी सुनो तुमको तीन जन्म का हाल कहती हूं। सो ध्यानपूर्वक सुनना। पहले जन्म में तुम राजा नहुष की पत्नी थी।

तुम्हारा नाम चंद्रमुखी था। मेरा नाम भद्रमुखी था। मैं ब्राम्हणी थी। हम तुम अयोध्या में रहते थे। मेरी तुम्हारी बड़ी प्रीति थी। एक दिन हम दोनों सरयू नदी में स्नान करने गए और दूसरी स्त्रियों को संतान सप्तमी का व्रत करते शिवपार्वती का पूजन करते देख हमने भी व्रत करने की प्रतिज्ञा की थी।

तुम तो राजमद के कारण सब भूल गई और झूठ बोलने का तुमको दोष लगा। जिसे तुम आज भी भोग रही हो। मैंने इस व्रत का आचार विचार सहित नियमपूर्वक सदैव व्रत किया। आज भी करती हूं। दूसरे जन्म में तुम्हें बंदरिया की योनि मिली तथा मुझे मुर्गी की योनि मिली।

भगवान शंकर की कृपा से इस व्रत के प्रभाव तथा भगवननाम को मैंने उस जन्म में भी याद रखा। निरंतर उस व्रत को नियमानुसार करती रही। तुम अपने इस संकल्प को इस जन्म में भी भूल गई। मैं तो समझती हूं कि तुम्हारे ऊपर जो भारी संकट है। उसका एक मात्र यहीं कारण है।

कोई दूसरा इसका कारण नहीं हो सकता है। इसलिए कहती हूं कि आप अब इस संतान सप्तमी के व्रत को करिए। जिससे तुम्हारा यह संकट दूर हो जाए। सप्त के व्रत को करिए जिससे तुम्हारा दुख दूर हो।

लोमश ऋषि ने कहा हे देवी भूषण ब्राम्हणी के मुख से अपने पूर्व जन्की कथा तथा व्रत संकल्प को सुनकर रानी को पुरानी बातें याद आ गई। पश्चाताप करने लगी। अब रानी भूषण ब्राम्हणी के चरणों में पड़ क्षमा याचना करने लगी।

भगवान शंकर पार्वती की अपार महिमा के गीत गाने लगी। उसी दिन से रानी ने नियमानुसार संतान सप्तमी का व्रत किया। जिसके प्रभाव से रानी को संतान सुख भी मिला तथा संपूर्ण सुख भोग कर रानी शिवलोक को गई।

लोमश ऋषि ने व्रत के विधि व महत्व को बताकर देवकी से इस व्रत को करने को कहा। इस कहानी को सुनाकर श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को व्रत का महत्व बताया।

पूजन सामग्री

मूर्तियां श्रीगणेश, शिवजी एवं गौरी की। पाटा, गंगाजल, कलश, दीपक, पंचगव्य, कुश, आसन, कलावा, श्वेत वस्त्र, वंदनवार, केला के पत्ते, बेल पत्र, यज्ञोपवीत की जोड़ी, सिंदुर,

केशर, चंदन, चावल, फूल एवं फूलों के हार, दियासलाई, धूप, कपूर, दीपक, नैवैद्य, फल, ताम्बुल, सुपारी, सुहाग, पिटारी, पकवान, मिठाई, शंख, घंटा, पूजन पात्र।


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