अंगद जैसे युवा के पांव को हिला भी न सका कोई योद्धा, जाने कारण

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त्रेतायुग में जब श्री हरि विष्णु श्री राम के रूप में अवतरित हुए थे तब उन्होंने कई राक्षसों का संहार किया था। सीता का हरण करने वाले रावण का भी अंत प्रभु श्री राम ने किया था। इसके लिए सागर पर सेतु बांधा और वानर सेना के साथ माता सीता की खोज कर दुष्ट रावण को मृत्यु प्रदान की। इस युद्ध में वानर सेना के एक से बढ़कर एक वीरों के विषय में हर कोई जानता है। राम भक्त हनुमान, वानरराज सुग्रीव, रिछ राज जामवंत, नल और नील जैसे महाबली सहित कई वीर योद्धा थे। इनमें से एक युवा योद्धा बाली का पुत्र अंगद था। इस लेख के माध्यम से हम अंगद के वीरता के विषय में बताएंगे। इसके अलावा रावण के दरबार में योद्धाओं द्वारा अंगद के पांव को क्यों नहीं हटा पाए इस पर भी विस्तार से बताएंगे।

भगवान राम ने अंगद को भेजा दूत बनाकर

जब श्री राम लंका पहुंच गए तब उन्होंने रावण के पास अपना दूत भेजने का विचार किया। सभा में सभी ने प्रस्ताव किया कि हनुमानजी को ही दूत बनाकर भेजना चाहिए। लेकिन राम जी ने यह का कि अगर रावण के पास हनुमान जी को भेजा गया तो यह संदेश जाएगा कि राम की सेना में अकेले हनुमान ही महावीर है। इसलिए किसी अन्य व्यक्ति को दूत बनाकर भेजा जाना चाहिए जो हनुमान की तरह ही पराक्रमी और बुद्धिमान हो। ऐसे में प्रभु श्री राम की नजर अंगद पर जा टिकी। अंगद ने भी प्रभु श्री राम के द्वारा सौंपे गए उत्तरदायित्व को बखूबी संभाला।

रावण की सभा में पहुंचा अंगद

युद्ध करने के पूर्व प्रभु श्री राम ने अंगद को रावण की सभा में अपना दूत बनाकर सुलह करने के लिए भेजा था। प्रभु श्री राम ने अंगत से कहा कि अंगद रावण के द्वार जाओ। कुछ सुलह हो जाए उनके और हमारे विचारों में एकता आ जाए। जाओ तुम उनको शिक्षा दो। जब अंगद रावण की सभा में पहुंचे तो वहां नाना प्रकार के वैज्ञानिक भी विराजमान थे। रावण और उनके सभी पुत्र विराजमान थे। रावण ने कहा कि आओ तुम्हारा आगमन कैसे हुआ तब अंगद ने कहा कि प्रभु मैं इसलिए आया हूं कि राम और तुम्हारे, दोनों के विचारों में एकता आ जाए। तुम्हारे यहां संस्कृति के प्रसा में अभाव आ गया है अब मै। उस अभाव को शांत करने आया हूं। चरित्र की स्थापना करना राजा का कर्तव्य होता है। तुम्हारा राज उत्तम प्रतीत नहीं हो रहा है इसलिए मैं आज यहां आया हूं। रावण ने कहा कि यह तो तुम्हारा विचार यथार्थ है परंतु मेरे यहां क्या सूक्ष्मता है
अब अंगद बोले तुम्हारे यहां चरित्र की सूक्ष्मता है राजा के राज में विज्ञान नही अंगद बोले कि हे रावण तुम्हारे राज में विज्ञान है परंतु विज्ञान का क्या बनता है एक मंगल यात्रा कर रहा परंतु मंगल की यात्रा का क्या बनेगा। जब तुम्हारे राज में अग्निकांड हो रहे है। हे रावण तुम सूर्य मंडल की यात्रा कर रहे हो, उस सूर्य की यात्रा करने से क्या बनेगा। जब तुम्हारे राज में एक कन्या का जीवन सुरक्षित नहीं। तुम्हारे राज्य का क्या बनेगा।
रावण ने कहा कि यह तुम क्या कह रहे हो तुम अपने पिता की परंपरा शांत कर गए हो। अंगद ने कहा कि कदापि नहीं मैं इसलिए आया हूं कि तुम्हारे राज्य और अयोध्या दोनों का समन्वय हो जाए। इस पर रावण मौन हो गया। नरायांतक बोले कि भगवान इसको विचारा जाए यह दूत है यह क्या कहता है। अंगद बोले यदि भगवान राम से तुम अपने विचारों का समन्वय कर लोगे तो राम माता सीता को लेकर चले जाएंगे। रावण ने कहा कि यह क्या कह रहे हो। मैं धृष्ट नहीं हूं अंगद बोले यहीं धृष्टता है संसार में किसी दूसरे की कन्या को हरण करके लाना एक महान धृष्टता है। तुम्हारी धृश्टता है कि राजा होकर भी पर स्त्रीगामी बन गए हो। जो राजा किसी स्त्री का अपमान करता है उस राजा के राज्य में अग्निकांड हो जाते है।

अंगद ने तोड़ा योद्धाओं का अहंकार

रावण ने कहा कि यह कटु उच्चारण कर रहा है। अंगद ने कहा कि मैं तुम्हारे प्राण की एक क्रिया निश्चित कर रहा हूं, यदि चरित्र की उज्ज्वलता है तो मेरा यह पग है इस पग को यदि कोई एक क्षण भी अपने स्थान से दूर कर देगा तो मैं उस समय माता सीता को त्याग करके राम को अयोध्या ले जाउंगा। अंगद ने प्राणी किया की और उनका शरीर विशाल एवं बलिष्ठ बन गया। तब उन्होंने भूमि पर अपना पैर स्थिर कर दिया। राज सभा में कोई ऐसा बलिष्ठ नहीं था जो उसके पग को एक क्षण भर भी अपनी स्थिति से दूर कर सके। अंगद का पग जब एक क्षण भर दूर नहीं हुआ तो रावण उस समय स्वतः चला परंतु रावण के आते ही अंगद ने कहा कि यह अधिराज है अधिराजों से पग उठवाना ठीक नही है। उन्होंने अपने पग को अपनी स्थली में नियुक्त कर दिया अैर कहा कि हे रावण तुम्हे मेरे चरणों को स्पर्श करना निरर्थक है। यदि तुम राम के चरणों को स्पर्श करो तो तुम्हारा कल्याण हो सकता है। रावण मौन होकर अपने स्ािल पर विराजमान हो गया। सरल भाषा में अंत में रावण जब खुद अंगद के पांव उठाने आया जो अंगद ने कहा कि मेरे पांव क्यों पकड़ते हो पकड़ना है तो मेरे स्वामी प्रभु श्री राम के पांव को पकड़कर उनकी शरण में आ जाओं तो तुम्हारे प्राण भी बच जाएंगे।

इस वजह से नहीं हिला सका कोई भी अंगद का पांव

अंगद बाली का पुत्र वानर राज सुग्रीव का भतीजा था। वानर सेना में तीन ऐसे व्यक्ति थे जिन्हें प्राण विद्या प्राप्त था। जिसमें से हनुमान, जामवंत और अंगद तीनों ही प्राण विद्या में पारंगत थे। इस प्राण विद्या के बल पर ही वे जो चाहे कर सकते थे। अंगद जब रावण की सभा में गए तो उन्होंने इसी प्राण विद्या के बल पर अपना शरीर बलिष्ठ और पैरों को इतना दृढ़ कर लिया था कि उसे हिलाना किसी के भी बस की बात नहीं थी। यह प्राण विद्या का ही कमाल था।

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