श्री राम व माता सीता के वियोग का कारण थे नारद मुनि, जाने पूरी कहानी

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नारद मुनि को ब्रम्हा का पुत्र कहा जाता है। नारद मुनि बहुत ही ज्ञानी और धर्मात्मा माने जाते है। शांत स्वभाव के देवता, दानव व मनुष्यों के बीच पहुंचन कर संवाद के माध्यम से संदेश देने का भी काम करते है। भगवान श्री राम व सीता जी के वियोग की कथा नारद जी से ही जुड़ी है आखिर नारदजी ने क्यों दिया था श्राप ज्योतिषाचार्य एवं वास्तुविद मनोज तिवारी ने इस लेख में पुराणों में वर्णित उस कथा को विस्तार से बताया है।

यह है पौराणिक कथा

पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार नारद मुनि को अपने ब्रम्हचर्य होने का अभिमान हुआ। उन्होंने काम देव जैसे कामी से भी विजयी होने की बात भगवान विष्णु के समक्ष कहीं। भगवान विष्णु ने नारद जी के अहंकार को तोड़ने के लिए माया से एक नगरी बनाई और सुंदर राजकुमारी के विवाह के स्वयंवर का आयोजन किया।

नारद को उस राजकुमारी के भविष्य की गणना के लिए बुलाया गया। तब नारद राजकुमारी पर ही मोहित हो गए और स्वयं भी उससे विवाह करने स्वयंवर में जाने की इच्छा जताई। नारद जी ने सोचा कि यह राजकुमारी हरि रूप पाकर ही उनका वरण करेगी।

तब नारदजी विष्णु भगवान के पास हरि के समान सुंदर रूप मांगने के लिए पहुंचे। विष्णु भगवान ने नारद की इच्छा के अनुसार उन्हें हरि रूप दे दिया। हरि रूप लेकर जब नारद राजकुमारी के स्वयंवर में पहुंचे तो उन्हें विश्वास था कि राजकुमारी उन्हें ही वरमाला पहनाएंगी।

लेकिन ऐसा नहीं हुआ राजकुमारी ने नारद को छोड़कर भगवान विष्णु के गले में वरमाला डाल दी। नारद जी वहां से उदास होकर लौट रहे थे तो रास्ते में एक जलाशय में उन्होंने अपना चेहरा देखा। अपने चेहरे को देखकर नारद हैरान हो गए। क्योंकि उनका चेहरा बंदर जैसा लग रहा था।

तब नारद समझ गए कि भगवान विष्णु ने उनसे छल किया है। गुस्से में नारद श्री हरि विष्णु के पास पहुंचे और आवेश में आकर भगवान को श्राप दे दिया कि आपको मनुष्य रूप में जन्म लेकर पृथ्वी पर जाना होगा। जिस तरह मुझे स्त्री का वियोग सहना पड़ा है उसी प्रकार आपको भी वियोग सहना होगा। इसलिए राम और सीता के रूप में जन्म लेकर विष्णु और देवी मां लक्ष्मी को वियोग सहना पड़ा।

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