माता का ऐसा मंदिर जहां ट्रेन की भी गति हो जाती है कम, जाने इस मां के विषय में

5

छत्तीसगढ़ देवी व देवताओं की नगरी है जहां पर सभी देवी-देवताओं के मंदिर है। खास बात यह है कि इस प्रदेश में भगवान राम तो पहुंचे ही थे वहीं उनके भक्त माने जाने वाले महादेव के अनगिनत शिव मंदिर यहां पर है। वहीं उनकी पत्नी यानी की देवी पार्वती के अनेकों मंदिर है।

दो हजार साल पुराना है माता बम्लेश्वरी का मंदिर, जाने मंदिर का इतिहास

जहां पर वे स्थापित है और प्रदेश के लोगों की रक्षा करते हुए उनका कल्याण भी करती है। नवरात्रि के पावन पर्व के दौरान हम इस लेख के माध्यम से ऐसे मंदिर का इतिहास बताने वाले है। जहां से गुजरने वाली ट्रेन की गति भी माता के सम्मान में धीमी हो जाती है।

बिलासपुर कटनी रेल खंड में दूरस्थ जंगलों के बीच भनवारटंक में मां मरहीमाता के नाम से निवास करती है। माना जाता है कि यहां पर माता का जीवंत रूप है।

यहां आने वाले भक्तों को हर संकट से मुक्ति मिलती हैं। स्थानीय लोगों के मुताबिक मरहीमाता 1984 में ट्रेन हादसा होने के बाद से यहां पर है। जब से भयंकर ट्रेन हादसा हुआ उसके बाद से मां यात्रियों की रक्षा करती है।

ऐसे हुई थी माता की स्थापना

स्थानीय लोगों के मुताबिक 1984 में इंदौर-बिलासपुर एक्सप्रेस रेल हादसे के बाद माता का दर्शन हुआ। रेल हादसे के बाद माता ने विशेष लोगों को दर्शन दिया। इसके बाद भक्तों ने दश्ज्र्ञन वाले स्थान पर छोटी सी मंदिर का निर्माण किया।

ऐसी मान्यता है कि माता का आशीर्वाद से बिलासपुर कटनी रेल रूट का जंगली क्षेत्र भनवारटंक में हादसे की कभी भी पुनरावृत्ति नहीं हुई। माता इस मार्ग से गुजरने वाले सभी यात्रियों की रक्षा करती है। इस लिए ट्रेन यहां से जो भी गुजरती है उसकी गति मंदिर के पास कम हो जाती है।

138 साल से सागौन के 24 स्तंभों पर खड़ा है मां दंतेश्वरी का मंदिर, जाने इतिहास

मंदिर में ही खाना पड़ता है प्रसाद

इस मंदिर की खास बात यह है कि यहां पर मां मरही को अर्पित किए जाने वाले प्रसाद को मंदिर परिसर में ही खाना पड़ता है। बताया जाता है कि मंदिर से कोई भी भक्त प्रसाद घर ले जाता है तो माता नाराज हो जाती है।

इसलिए यहां पर जो भी भक्त जाते है वह प्रसाद को खुद खाते है और वहां उपस्थित भक्तों में बांटते है। कोई भी प्रसाद को घर नहीं लाता है माता के दरबार में ही बैठकर ग्रहण करते है।

51 शक्तिपीठों में एक है रतनपुर में आदिशक्ति मां महामाया, जाने मंदिर का इतिहास