माता सीता का अवतरण हुआ था धरती से, जानिए माता सीता के जन्म की कथा

धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की नवमीं तिथि पर मां सीता का जन्म हुआ था। ज्योतिषाचार्य एवं वास्तुविद मनोज तिवारी के मुताबिक इस दिन को माता सीता का प्राकट्य माना जाता है। त्रेतायुग में माता सीता को लक्ष्मी का अवतार माना जाता है। भगवान शिव का धनुष तोड़कर विष्णुजी के अवतार श्री राम ने सवयंवर में सीता का वरण किया था। इसके बाद उन्होंने पतिव्रत धर्म निभाया और वनवास में भी अपने पति के साथ गई। सीता नवमी पर उनकी पूजा विशेष लाभदायी होती।

मां सीता के जन्म की कथा

रामायण के मुताबिक एक दिन मिथिला के राजा पूजा-पाठ और यज्ञ करवाने के लिए हल से खेत जोत रहे थे, तभी उनका हल एक ठोस चीज से टकराय। उन्होंने उस ठोस चीज को निकाला और देखा कि वहां एक लोटा था। उस लोटे में एक सुंदर और कोमल कन्या थी। राजा का नाम जनक था और उनकी कोई संतान नहीं थी। उस कन्या को देखकर वह बहुत खुश हुए और उसे पालने-पोसने लगे। इसीलिए माता सीता को जनकपुत्री और जनकदुलारी भी कहा जाता है। बहुत ही कम लोग यह जानते है कि मैथिलि भाषा में हल का मतलब सीता होता है। राजा जनक को यह कन्या हल चलाने के दौरान मिली थी इसलिए इस कन्या का नाम सीता रखा गया था।

सीता नवमीं पर करे इस तरह से पूजा

सीता नवमीं पर सुबह ब्रम्हमुहूर्त में उठकर स्नान करे। फिर व्रत का संकल्प लिजिए। भगवान गणेश की पूजा करके मां सीता और भगवान राम की पूजा-अर्चना कीजिए। परंपरा के अनुसार माता सीता को पीले फूल और पीले वस्त्र के साथ सोलह श्रृंगार का सामान भेंट करना चाहिए। ऐसा करना शुभ माना जाता है। पूजा के बाद माता सीता की आरती कीजिए। माता सीता को दूध और गुड़ से बने प्रसाद अर्पित कीजिए और रामाभ्यां नमः मंत्र का जाप कीजिए।

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