वैवाहिक जीवन की समस्त परेशानियां दूर करेंगे माता सीता व भगवान राम, जाने विवाह पंचमी का महत्व

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विवाह पंचमी की तिथि काफी महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस दिन माता सीता व भगवान राम का विवाह सम्पन्न हुआ था। इस लिए विवाह पंचमी की तिथि के दिन इनकी विधि-विधान से पूजा-अर्चना करने से विवाह से संबंधित सभी परेशानियां दूर होती है।

इस बार विवाह पंचमी की तिथि 19 दिसंबर को पड़ रही है। इस दिन विवाह का अबूझ मुहूर्त भी होता है। इस लेख के माध्यम से हम विवाह पंचमी के महत्व को बताएंगे।

ज्योतिषाचार्य एवं वास्तुविद मनोज तिवारी ने बताया कि हर साल मार्गशीर्ष मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी की तिथि को विवाह पंचमी के रूप में मनाया जाता है।

इस दिन भगवान राम और माता सीता का विवाह हुआ था। भृगु संहिता के मुताबिक विवाह पंचमी के दिन शादी का अबूझ मुहूर्त होता है। इस दिन किसी का भी विवाह किया जा सकता है।

हालांकि भगवान राम औरा माता सीता के वैवाहिक जीवन में संघर्ष होने के कारण लोग इस दिन विवाह करने से हिचकिचाते है।

कुंवारी कन्याओं को मनचाहे वर की प्राप्ति

धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक विवाह पंचमी के दिन को बहुत शुभ माना जाता है। इस दिन भगवान राम और माता सीता का पूजन करने से कुंवारी कन्याओं को मनचाहे वर की प्राप्ति होती है।

साथ ही शादी में आ रही अड़चने दूर होती है। वहीं अगर शादीशुदा लोग ऐसा करे तो उनके वैवाहिक जीवन के कष्ट दूर होते है।

इस दिन राम चरितमानस का पाठ करने से परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।

ऐसे करे पूजा

स्नान के बाद एक पीड़ा या पाटे पर भगवान राम और माता सीता की प्रतिमा स्थापित करे। भगवान राम को पीले वस्त्र व माता सीता को लाल वस्त्र पहनाएं।

इसके बाद रोली, अक्षत, पुष्प, धूप और दीप आदि से उनका पूजन करे। प्रसाद चढ़ाएं और विवाह पंचमी की कथा पढ़े। ओम जानकी वल्लभाए नमः की 1, 5, 7 या 11 माला जाप करे।

यह है पौराणिक कथा

भगवान विष्णु का जन्म राजा दशरथ के घर भगवान राम के रूप में हुआ था और माता लक्ष्मी सीता मां के रूप में राजा जनक के घर पली बढ़ी थी।

एक बार माता सीता ने मंदिर में रखे धनुष को उठा लिया था। इस धनुष को परशुराम के अलावा और कोई नहीं उठा पाया था।

तब से राजा जनक ने यह घोषणा कर डाली कि जो कोई भी भगवान विष्णु के इस धनुष को उठाएगा उसी से सीता का विवाह होगा।

स्वयंवर में महर्षि वशिष्ठ के साथ भगवान राम और लक्ष्मण भी दर्शक के रूप में बैठे थे। सीता के स्वयंवर में कई राजाओं ने प्रयास किया लेकिन कोई भी इस धनुष को हिला नहीं पाया।

इस प्रकार राजा जनक के करूणा भरे शब्दों में कहा मेरी सीता के लिए कोई योग्य वर नहीं है तब राजा जनक को देख महर्षि वशिष्ठ ने भगवान राम से इस स्वयंवर में हिस्सा लेने को कहा।

गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए भगवान श्री राम ने धनुष को उठाया और उस पर प्रत्यंचा चढ़ाने लगे।

प्रत्यंचा चढ़ाते वक्त धनुष टूट गया। भगवान श्री राम के बलिष्ठ को देख माता सीता उन पर मोहित हो गई और जयमाला श्रीराम के गले में डाल दी। इस तरह भव्य आयोजन में माता सीता और भगवान श्रीराम का विवाह सम्पन्न हुआ।

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