भगवान राम के वनवास का अधिकतर समय गुजरा है छत्तीसगढ़ के जंगलों में, जाने इस लेख से

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श्री राम का नाम पुण्यकारी है इस बात को तो हर कोई जानता है। लेकिन इस छत्तीसगढ़ प्रदेश को भी भगवान राम का आशीर्वाद मिला है। इस बात को कम लोग ही जानते है।

भगवान राम का नैनिहाल तो यह प्रदेश है साथ ही इस प्रदेश में भगवान ने अपनी पत्नी सीता व भाई लक्ष्मण के साथ वनवास के अधिकतर समय यहां के अरण्यों में बिताया।

राम के वनवास की जब भी बात होती है तो उसमें दक्षिणापथ के विषय में उल्लेख किया गया है। यह दक्षिणापथ हमारा प्रदेश छत्तीसगढ़ है जो अरण्यों से घिरा था।

माना जाता है कि भगवान श्री राम के वनवास का अधिकतर समय यहीं बिता है। इस लेख के माध्यम से हम पुराणों व इतिहासकारों के अध्ययन के बाद जो तथ्य मिले है उन्हीं के आधार पर इसकी जानकारी देंगे।

वाल्मिकी रामायण में है इसका उल्लेख

श्री राम के वनवास के दौरान वे किन-किन क्षेत्रों में गए इसका उल्लेख रामायण में मिलता है। वाल्मिकी रामायण में विशेष तौर पर छत्तीसगढ़ के अरण्य क्षेत्रों का वर्णन है।

भगवान राम जब अयोध्या से वनवास में निकलने के बाद भगवान राम गंगानदी पार कर चित्रकूट में कुटिया बना ली थी। उन्हें उम्मीद थी कि इतनी दूर अयोध्या के लोग उनसे मिलने नहीं आ पाएंगे।

लेकिन भरत नैनिहाल से जब लौटे और बड़े भाई के साथ लक्ष्मण और माता सीता के भी वनवास जाने की खबर मिली तो उन्होंने अपनी मां कैकेई को बहुत धिक्कारा और भगवान राम से मिलने निकल पड़े।

लंबी यात्रा के बाद वे चित्रकूट पहुंचे और राम को अयोध्या लौट चलने की जिद करने लगे। लेकिन राम नहीं माने और उन्होंने अपना खड़ाउ देकर विदा किया।

भरत के जाने के बाद रामजी ने सोचा कि अब अयोध्या के लोग जान गए है कि वे यहां है तो वे बार.बार उनसे मिलने पहुंचेंगे। बेहतर है कि चित्रकूट छोड़ कर नई राह पकड़ी जाए।

अपने ही पुरखे दंड की गलतियों से नश्ट हुए प्रदेष् दंडकवन में प्रवेश किया। दंडक वन या दंडकारण्य में उस वक्त घने जंगल थे और राक्षसों व भयानक जानवारों का बसेरा था।

छत्तीसगढ़ में ही वह दंडकारण्य है। पवित्र नदियों से होकर दंडकारण्य पहुंचे छत्तीसगढ़ को उस समय दक्षिण कोसल कहा जाता था।

इसे उत्तर से दक्षिण भाग का जोड़ने वाला दक्षिणापथ भी कहा जाता है। वाल्मिकी रामायण में दक्षिणापथ का उल्लेख है। सबसे पहले वे सरगुजा संभाग के कोरिया जिले में पहुंचे थे।

प्रदेश भर में रखा है राम ने अपना पग

श्री राम सरगुजा के पहाड़ों पर रहे। शिवरीनारायण में माता सीता की तलाश में पहुंचे। तुरतुरिया में महर्षि वाल्मिकी का आश्रम है जहां पर लव व कुश का जन्म माना जाता है।

राजिम में संगम क्षेत्र में अपने कुलदेवता महादेव की पूजा की थी। धमतरी के सिंहावा में विभिन्न पहाड़ियों में मुचकुंद आश्रम, अगस्त्य आश्रम, अंगिरा आश्रम, श्रृंगी ऋषि के आश्रम, कंकर ऋषि,

शरभंग ऋषि आश्रम व गौतम ऋषि आश्रम आदि ऋषियों का आश्रम है राम ने दंडकारण्य के आश्रम में ऋषियों से भेंटर कुछ समय व्यतीत किया था।

जगदलपुर से भी गुजरे थे इसी तरह से राम भगवान के चरण कमल इस प्रदेश में पड़ने की जानकारी है।

कई क्षेत्र उनके नाम से है सरगुजा में

रामगढ़ की पहाड़ी में तीन कक्षों वाली सीताबेंगरा की गुफा है देश की सबसे पुरानी नाट्य शाला कहा जाता है।

जांजगीर में माता शबरी से मिले और जुठे बेर खाए यहां शबरी का मंदिर है। चंदखुरी तो श्री राम का नैनिहाल था तो यहां तो वे कई बार पहुंचे।

लक्ष्मणेश्वर शिव मंदिर, राम झरना सहित कई उदाहरण है जो उनके यहां आने का साक्ष्य देती है।

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