सूर्य देव के उत्तरायण का पर्व मकर संक्रांति इस वर्ष 14 जनवरी को ही मनाया जाएगा, जाने विस्तार से पर्व के विषय में

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सूर्य देव के उत्तराणय का पर्व मकर संक्रांति आगामी 14 जनवरी को मनाया जाएगा। मकर संक्रांति ही एक ऐसा पर्व है। जिसका निर्धारण सूर्य की गति के अनुसार होता है।

पौष मास में जब सूर्य देव धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते है तो उस काल विशेष को ही संक्रांति कहते है। ज्योतिषाचार्य एवं वास्तुविद मनोज तिवारी ने बताया कि यू ंतो प्रति मास ही सूर्य बारह राशियों में एक से दूसरी में प्रवेश करता रहता है।

पर वर्ष की बारह संक्रांतियों में यह सब से महत्वपूर्ण है। इस बार मकर संक्रांति का पर्व 14 जनवरी को ही होगा। हर साल यह पर्व 14 जनवरी को ही होता है लेकिन किसी वर्ष यह पर्व 12, 13 व 15 जनवरी को भी हो सकता हैं

यह इस बात पर निर्भर करता है कि सूर्य कब धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करता है। इस दिन से सूर्य देव की गति उत्तरायण हो जाती है। इसी कारण से इसे उत्तरायणी भी कहते है।

मकर संक्रांति पर्व का महत्व

शास्त्रों के मुताबिक दक्षिणायन को देवताओं की रात्रि यानि नकरात्मकता का प्रतीक तथा उत्तरायण को देवताओं का दिन अर्थात् सकरात्मकता का प्रतीक माना जाता है।

इसलिए इस दिन जप, तप, दान, स्नान, श्राद्ध, तर्पण जैसे धार्मिक क्रियाकलापों का विशेष महत्व है। ऐसी धारणा है िकइस अवसर पर दिया गया दान सौ गुना बढ़कर पुण्य प्राप्त होता है। इस दिन शुद्ध घी एवं कंबल का दान मोक्ष की प्राप्ति करवाता है।

मकर संक्रांति के अवसर पर गंगा स्नान एवं गंगातट पर दान को अत्यंत शुभ माना गया है। इस पर्व पर तीर्थराज प्रयाग एवं गंगासागर में स्नान को महा स्नान की संज्ञा दी गई है। मकर संक्रांति से सूर्य उत्तरी गोलार्द्ध की ओर आना शुरू हो जाता है।

इस लिए इस दिन से राते छोटी एवं दिन बड़े होने से प्रकाश अधिक होगा तथा रात्रि छोटी होने से अंधकार कम होगा। मकर संक्रांति पर सूर्य की राशि में हुए परिवर्तन को अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर होना माना जाता है। प्रकाश अधिक होने से प्राणियों की चेतनता एवं कार्य शक्ति में वृद्धि होगी।

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