ढाई दिन के लिए मायके आएंगी महालक्ष्मी, जाने देवी ज्येष्ठा व कनिष्ठा के विषय में

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गणेशोत्सव में भगवान गणेश की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। ऐसे में महालक्ष्मी की पूजा का विधान भी माना गया है। महालक्ष्मी के दत्तक पुत्र के तौर पर भगवान गणेश को जाना जाता है। गणपति की आराधना में जीतना महत्वपूर्ण मां पार्वती की आराधना का होता है।

उतना ही महत्व मां लक्ष्मी की भी पूजा का होता है। गणेश चतुर्थी के दौरान महालक्ष्मी व महागौरी ज्येष्ठा-कनिष्ठा के रूप में घरों में आती है। इस लेख के माध्यम से हम ज्येष्ठा-कनिष्ठा देवी के मायके आने के विषय में पूरी जानकारी देंगे। साथ ही पूजन विधि को भी बताएंगें।

महाराष्ट्रीयन समाज में गणेशोत्सव के दौरान देवी ज्येष्ठा-कनिष्ठा के रूप में पूजन करने का विधान है। घरों में महालक्ष्मी का आगमन सोमवार को शाम से होगा।

महाराष्ट्रीयन घरों में ज्येष्ठा-कनिष्ठा स्वरूप की स्थापना की जाएगी। विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाएगी। मंगलवार को विभिनन व्यंजनों का भोग लगाया जाएगा। फिर बुधवार को विदाई होगी।

ढाई दिन के लिए आती है महालक्ष्मी

परंपरा के मुताबिक ढाई दिन के लिए महालक्ष्मी नामक दो बहने अपने बच्चों के साथ मायके पहुंचती है। सप्तमी और अनुराधा नक्षत्र में उनकी स्थापना की जाती है।

ढाई दिन तक मायके में रहने के बाद नवमीं के दिन महालक्ष्मी की विदाई होती है। इस दौरान सुख-समृद्धि की कामना के साथ उनकी पूजा-अर्चना की जाती है। घरों में उत्साह का वातावरण रहता है।

पीढ़ी दर पीढ़ी चलती है एक ही प्रतिमा

महालक्ष्मी की प्रतिमा का विसर्जन नहीं किया जाता है। बल्कि एक ही प्रतिमा को परिवार में पीढ़ी दर पीढ़ी पूजा-अर्चना की जाती है। इसके लिए प्रतिमाओं के मुखौटे अलग से रहते है। जब स्थापना की जाती है।

तो यह मुखौटे निकाले जाते है। लोहे से बने पायली पर कपड़े से बने हाथ, कपड़े से बना धड़ लगाते है। इसके बाद इस पर मुखौटा लगाते है। उसे साड़ी पहनाई जाती है।

16 श्रृंगार किया जाता है देवियों का

पूजन के लिए तैयार की गई प्रतिमाओं में मां के ज्येष्ठा-कनिष्ठा रूप की पूजा की जाती है। इसके साथ ही इनको 16 श्रृंगार कर सजाया जाता हैं।

पायल, काजल, बिंदी, नथ, चूडी, हार, बिछिया, बाजूबंध, कमरबंध सहित हर तरह से श्रृंगारित किया जाता है।

100 तरह के पकवानों का लगाया जाता है भोग

महाराष्ट्रीयन परिवारों में महालक्ष्मी पूजा के दौरान पहले श्रृंगार फिर 100 तरह के व्यंजन बनाकर महालक्ष्मी को भोग अर्पित किया जाता है।

इसमें अलग-अलग तरह के मीठे पकवान, मिठाई, सिरा, लड्डू, कई तरह के भाजी, सब्जी, कई तरह की चटनी सहित लगभग 100 तरह के पकवान का भोग लगाया जाता है। जिसे बाद में घर के लोगों को प्रसाद के रूप में खिलाया जाता है।

ढाई दिन बाद होती है विदाई

ज्येष्ठा-कनिष्ठा देवियों का ढाई दिन तक मायके में सेवा सत्कार किया जाता है। इसके बाद उनसे आशीर्वाद लेकर उन्हें फिर अगले साल आने के लिए कहते हुए विदाई देते है। इस पूजन को सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।

2 COMMENTS

  1. 🙏जय महालक्ष्मी देवी 🙏
    🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸

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