मां पार्वती ने ऐसे उत्पन्न किया था अपने पुत्र गणेश को, जाने पौराणिक कथा

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मां पार्वती के परिवार के विषय में सभी जानते है। मां पार्वती को गौरी कहा जाता है और वे आदिशक्ति मां दुर्गा भी है। उनके दो पुत्र है भगवान कार्तिकेय व गणेश। दोनों ही पुत्रों के जन्म की कथा रोचक है। आज हम इस लेख के माध्यम से भगवान गणेश के उत्पन्न होने की कथा को बताएंगे।

गणेश जी का हिन्दू धर्म में बड़ा उंचा स्थान है। प्रत्येक शुभ कार्य का आरंभ करने के पूर्व उनका स्मरण करने की पंरपरा है। माना जाता है कि उनके नाम लेने मात्र से ही समस्त विघ्न दूर हो जाते है। विघ्न विनाशक गणेश देवों में प्रथम पूज्य तो है ही वहीं मां पार्वती के लाडले गौरी पुत्र गणेश कहे जाते है। इसी तरह से मां लक्ष्मी के दत्तक पुत्र भी है। भगवान गणेश की उत्पत्ति माता पार्वती ने की थी।

शिव पुराण में है गणेश की उत्पत्ति का वर्णन

भगवान गणेश की उत्पत्ति के विषय में शिव पुराण में विस्तार से वर्णन है। उसमे ंजो कथा प्राप्त है उसके मुताबिक मां पार्वती के द्वारा जन्म तो नहीं दिया गया है लेकिन उनके द्वारा ही भगवान गणेश को उत्पन्न किया गया है। गणेश जी का वास्तविक नाम विनायक भी है। कथा के मुताबिक भगवान गणेश के जन्म अथवा उत्पत्ति की कथा है जिसमें बताया गया है कि पार्वती ने एक बार शिव जी के गण नंदी के द्वारा उनकी आज्ञा पालन में त्रुटि के कारण अपने शरीर के मैल और उबटन से एक बालक का निर्माण कर उसमें प्राण डाल दिए और कहा कि तुम मेरे पुत्र हो। तुम मेरी ही आज्ञा का पान करना और किसी की नही। देवी ने पुत्र गणेश से यह भी कहा कि हे पुत्र मैं स्नान के लिए भोगावती नदी जा रही हूं कोई भी अंदर न आने पाए। कुछ देर बाद वहां पर भगवान शंकर

आए और पार्वती के भवन में जाने लगे। यह देखकर उस बालक ने विनयपूर्वक उन्हें रोकना चाहा। बालक हठ देखकर भगवान शंकर क्रोधित हो गए। इसे उन्होंने अपना अपमान समझा और अपने त्रिशूल से बालक सिर धड़ से अलग कर भीतर चले गए। स्वामी की नाराजगी का कारण पार्वती समझ नहीं पाई। उन्होंने तत्काल दो थालियों में भोजन परोसकर भगवान शिव को आमंत्रित किया। तब दूसरी थाली देख शिव ने आश्चर्यचकित होकर पूछा कि यह किसके लिए है। पार्वती बोली यह मेरे पुत्र गणेश के लिए है जो बाहर द्वार पर पहरा दे रहा है। क्या आपने आते वक्त उसे नहीं देखा। यह बात सुनकर शिव बहुत हैरान हुए और पार्वती का ेसारा वृतंात कह सुनाया। यह सुन देवी पार्वती क्रोधित हो विलाप करने लगी। उनकी क्रोधाग्नि से सृष्टि में हाहाकार मच गया।

तब सभी देवताओं ने मिलकर उनकी स्तुति की और बालक को पुर्नजीवित करने के लिए कहा। तब पार्वती को प्रसन्न करने के लिए भगवान शिव ने एक हाथी के बच्चे का सिर काटकर बालक के धड़ से जोड़ दिया। कहते है कि भगवान शंकर के कहने पर भगवान विष्णु ने एक हाथी का सिर काटकर लाए थे और उन्होंने धड़ बालक में जोड़कर उसे जीवित कर दिया। भगवान शंकर व अन्य देवताओं ने उस गजमुख बालक को अनेक आशीर्वाद दिए। देवताओं ने गणेश, गणपति, विनायक, विघ्नहर्ता, प्रथम पूज्य आदि कई नामों से उस बालक की स्तुति की।

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